लखनऊ के पश्चिम में हरदोई रोड पर काकोरी नाम का एक कस्बा है। यह आम की बागवानी और क्रांतिकारी कांड के लिए तो मशहूर है ही, इसका इतिहास भी कम रोचक नहीं है।
11वीं शताब्दी के अंतिम दिनों में काकोरी पर कसमंडी (कंसमडप) मलिहाबाद के निकट के राजा कंस का अधिकार था, जो जाति का रजपासी था। उस समय यहां भरों की बस्ती थी।
जब सैय्यद सालार मसूद गाजी दिल्ली से यहां आएं तब उनसे इस राजा ने युद्ध किया। इस लड़ाई में कंस काकोरी हार बैठे और यह कस्बा मुलसलमानों के हाथ आ गया।
हालांकि जब मुसलमानों का प्रभुत्व कम हुआ तो यहां एक बार फिर भरों ने रहना शुरू कर दिया। 12वीं सदी तक यहां भरों का ही साम्राज्य रहा।
1202 में कुतुबद्दीन ऐबक ने मुहम्मद बख्तयार खिलजी को हाकिम सरदार लश्कर बनाकर भेजा। पूरब की गवर्नरशिप लेने के लिए जब वह लखनपुर से गुजरा तो उसने काकोरी के पास बख्तयार नगर बसाया और उसने अपने कुछ पठानी साथियों को यहीं छोड़ दिया।
इन्हीं लोगों ने लखनपुर को लखनऊ कहना शुरू कर दिया। भरों के बढ़ते हुए जोर को दबाने के लिए सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश ने मलिक नासिरुद्दीन को यहां भेजा जो भरों को युद्ध में पराजित करके यहां दिल्ली की हुकूमत कायम कर गया।
फिर मुहम्मद तुगलक के आखिरी वक्त तक इस पर दिल्ली का ही आधिपत्य बना रहा। 13वीं सदी में भरों के राजा काकोर ने काकोरी का किला बनवाया और इसके चारों ओर लोग रहने लगे।
सन् 1458 में ही बैस राजा साथन ने जो कि राजा रोहितास का बेटा था, काकोरी पर अधिकार कर लिया। राजा साथन की मौत के बाद सुल्तान हुसैन शर्की ने काकोरी को फिर से इस्लामी जामा पहनाना शुरू किया।
उसकी हुकूमत में सन् 1478 तक ये बस्ती जौनपुर की जागीर बनी रही मगर इसी सन् में साथन के बेटे राजा तिलोक चंद ने फिर काकोरी पर कब्जा कर लिया।
सिकंदर लोदी के जमाने में काकोरी दिल्ली के हाथों में पहुंच गया और इसे अवध सूबे के मातहत कर दिया गया। शेरशाह काल में यहां कई मस्जिदों और मकबरों का निर्माण किया गया। इसमें से ही एक प्रसिद्ध इमारत है झंझरी रौजा।
यह इमारत वहां बने और सभी इमारतों से अलग है। इसमें मख्दूम साहब के एक खास शागिर्द शेख भीखम शाह और बादशाह अकबर के दामाद उनकी बेगम की कब्रें हैं।
रौजे के बाहर एक हजरत मख्दूम मौलाना कारी अमीर निजामुद्दीन साहब की मजार है। इसके अलावा काकोरी कांड का इतिहास तो आज दुनिया में मशहूर है।