छोटे मामलों में अभियुक्तों को बरी किए जाने के खिलाफ या उनकी सजा बढ़ाए जाने के लिए स्टेट अपीलों को लेकर हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अख्तियार किया है।
कोर्ट ने कहा कि हत्या व दुष्कर्म के गंभीर मामलों में तो अपील दाखिल नहीं की जाती जबकि कम सजा वाले मामलों में सजा बढ़ाने के लिए स्टेट अपील दाखिल कर दी जाती है। सरकार की तरफ से ‘रूटीन’ की तरह अपीलें दाखिल नहीं की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह तल्ख टिप्पणी लखीमपुरी खीरी जिले के एक मामले में राज्य सरकार की तरफ से दायर की गई अपील पर किया। इसमें अभियुक्तों को सुनाई गई सजा बढ़ाए जाने की गुजारिश की गई थी।
लखीमपुर खीरी की सत्र अदालत ने 16 जुलाई 2014 को गंभीर चोट पहुंचाने के आरोप में अभियुक्तों श्रीधर व अन्य को दो-दो साल के कठोर कारावास के साथ एक-एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
इसमें सरकार की तरफ से अधिवक्ता ने कहा कि यह हत्या के प्रयास का मामला बनता है और सुनाई गई सजा पर्याप्त नहीं हैं लिहाजा इसे बढ़ाया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की ऐसी कोई ‘फाइंडिंग्स’ नहीं हैं कि अभियुक्तों द्वारा पहुंचाई गईं चोटें जानलेवा थीं। घटना 9 अप्रैल 2008 की है, जिसमें दो साल की सजा सुनाई गई है।