इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आईटी एक्ट) की धारा 66-ए के तहत कोई प्राथमिकी दर्ज न हो और न ही कोई अदालत इसके तहत दाखिल आरोप पत्र पर संज्ञान ले।
क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2015 को एक फैसले में इस धारा को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने इस फैसले से सभी जिला अदालतों और डीजीपी को अवगत कराने का आदेश सीनियर रजिस्ट्रार को दिया है।
कोर्ट ने कहा कि यह आदेश मिलने के बाद ये प्राधिकारी जरूरी कार्रवाई करेंगे। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान ने अहम नजीर वाला यह फैसला हर्ष कदम की याचिका पर दिया।
याचिका में स्थानीय नाका थाने के एक मामले में धारा 66-ए के तहत दायर चार्जशीट समेत उस पर निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान व तलबी आदेश को चुनौती देकर रद्द करने की गुजारिश की गई थी।
याची का कहना था कि आईटी एक्ट (संशोधित) 2008 की धारा 66-ए के तहत की गई यह कार्रवाई कानून की मंशा के खिलाफ है।
उधर, सरकारी वकील अनिरुद्ध सिंह ने भी कोर्ट को बताया कि 24 मार्च 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला में धारा 66-ए को रद्द कर दिया था। सुनवाई के बाद कोर्ट ने उक्त मामले में विवेचक द्वारा दिमाग का इस्तेमाल न करने का उदाहरण करार देते हुए आरोप पत्र समेत तलबी आदेश को रद्द कर दिया।