सुनवाई के दौरान जस्टिस अनिल कुमार और जस्टिस रेखा दीक्षित ने कहा कि पूर्वोत्तर रेलवे ने ट्रिब्यूनल के निर्णय का बिना पालन किए उसे याचिका में चुनौती दी है। याचिका लंबित रहने के दौरान भी जब तक कोर्ट कोई निर्णय न करे, ऐसी कोई वजह नहीं है कि रेलवे आदेश का पालन न करे।
पूर्वोत्तर रेलवे का तर्क : पति-पत्नी या पुत्र-पुत्री ही नौकरी के हकदार
पूर्वोत्तर रेलवे ने अपने तर्क में कहा कि उसकी नियुक्ति समिति ने अगस्त 2016 में रेलवे बोर्ड के निदेशक स्थापना को उचित कार्रवाई के लिए निर्देश दिए थे, जिन्होंने दिसंबर 2016 में आगे आदेश जारी किए। चयन समिति ने मार्च 2017 में इस पर निर्णय लिया। मंडल कार्मिक अधिकारी लखनऊ ने यह निर्णय संबंधित परिवार को बताया। उन्होंने बताया कि महालेखाकार से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए निर्णय के अनुसार पति-पत्नी या पुत्र-पुत्री के अलावा कर्मचारी के अन्य आश्रितों को अनुकंपा पर नौकरी नहीं दी जा सकती।
मौजूदा मामले में रेलवे बोर्ड और समिति ने विचार किया है, लेकिन वे नियमों को नहीं बदल सकते, न ही इसे अपवाद मानते हुए रंजीता को नौकरी दी जा सकती है। मंडल स्तर पर नियमों से हटकर अनुकंपा पर नौकरी नहीं दी जा सकती है। नियमों के तहत रंजीता नौकरी की हकदार नहीं है क्योंकि वह मृत कर्मचारी की ‘करीबी रिश्तेदार’ है, विधवा या पुत्र-पुत्री नहीं।
हाईकोर्ट ने रेलवे का तर्क सुनने के बाद कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जिस निर्णय का हवाला दिया गया है, उसमें ‘करीबी रिश्तेदार’ विस्तृत रूप से परिभाषित नहीं है। यह समझ से परे है कि कैसे एक विधवा बेटी जो अपने पिता के साथ रह रही है, उसका अनुकंपा पर नौकरी का अधिकार अपने ससुर के साथ रह रही विधवा बहू से अधिक हो सकता है।
अनुकंपा पर नौकरी में विधवा बहू को विधवा बेटी के बराबर मानने को कदम उठाए सरकार
हाईकोर्ट ने इस मामले में परिवार में बहू को शामिल न करने पर कहा, ‘यह मनमानी आज भी जारी है, इसे रोका जाना चाहिए, इसके लिए बहू को ‘परिवार’ की परिभाषा में शामिल करना होगा। वरना परिवार की यह परिभाषा अतार्किक लगेगी। सरकार इस बारे में विचार करे और उचित कदम उठाए ताकि विधवा बहू को भी अनुकंपा पर नियुक्ति में विधवा बेटी के बराबर माना जा सके।’
अदालत ने यह भी कहा कि ‘परिवार शब्द की कानूनी परिभाषा में उदारता बरतने की जरूरत है। इसमें परिवार के सदस्यों का उपयुक्त समावेश होना चाहिए। मौजूदा मामले में बहू परिवार की उत्तराधिकारी भी है। उसे एक परिवार के सदस्य के तौर पर अपने परिवार को चलाना है। उसे परिवार की परिभाषा में शामिल करना ही चाहिए।’
चार हफ्ते में निर्णय ले रेलवे
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रंजीता बाजपेयी रेलवे को तीन हफ्ते में ताजा प्रस्ताव दें। इस पर अगले चार हफ्ते में रेलवे निर्णय लेगा। रेलवे अपने निर्णय में मौजूदा याचिका में सामने आए तथ्यों का ध्यान रखे।