इस बीच मेरठ के डीएवी महाविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर दी। इसमें कहा गया कि साल 2013-14 की प्रवेश परीक्षा में जो विद्यार्थी नहीं बैठे थे, लेकिन नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजूकेशन द्वारा निर्धारित योग्यताएं और गाइडलाइन पूरी करते हैं, उन्हें सीधे एडमिशन देने की अनुमति महाविद्यालय को मौजूदा सत्र में ही दी जाए।
नवंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी। इस आदेश में कहा गया कि 16 नवंबर 2013 के बाद किसी को भी एडमिशन देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस निर्णय के आधार पर विभिन्न विश्वविद्यालयों ने अपने यहां और अपने से संबद्ध महाविद्यालयों में सीधे एडमिशन पाए इन 35 हजार बीएड विद्यार्थियों के परिणामों पर ही रोक लगा दी।
इसके खिलाफ बीसियों विद्यार्थियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की। उनका कहना था कि वे अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, अब उनके परिणाम जारी किए जाएं। उन्हाेंने डीएवी महाविद्यालय के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अपने से गैर-संबंधित बताया।
सरकार ने कहा, उसे आपत्ति नहीं
याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार ने अपना पक्ष रखा कि उसके ही शासनादेश पर 35 हजार विद्यार्थियों का एडमिशन हुआ था। उसे परिणाम जारी होने पर कोई आपत्ति नहीं है, न ही वह इसमें कोई बाधा देखती है।
निर्णय : सभी याचिकाएं मंजूर
मामले में अभ्यर्थियों के अधिवक्ता रजत राजन सिंह के अनुसार जस्टिस विवेक चौधरी ने निर्णय में कहा कि सभी याचिकाएं मंजूर की जाती हैं। संबंधित विश्वविद्यालय छह हफ्ते में परिणाम जारी करें। साथ ही कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश दूसरे महाविद्यालय और मामले से संबंधित था। चूंकि सरकार को भी कोई आपत्ति नहीं है, ऐसे में परिणाम जारी किए जाने चाहिए।