भाजपा विधायक व पूर्व मंत्री ब्रह्मदत्त द्विवेदी और उनके गनर की हत्या में सपा के पूर्व विधायक विजय सिंह और माफिया संजीव माहेश्वरी की उम्रकैद की सजा को हाईकोर्ट ने बरकार रखा है।
हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दोनों की आपराधिक पुनर्विचार याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस डॉ. विजय लक्ष्मी ने 17 जुलाई 2003 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश लखनऊ के निर्णय को बरकरार रखा। हत्या 10 फरवरी 1997 को की गई थी।
हाईकोर्ट ने पूर्व विधायक विजय सिंह को निर्देश दिया कि वे लखनऊ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष पांच जून तक सरेंडर करें। विजय इस समय बेल पर हैं।
ऐसा न करने पर न्यायाधीश को उचित कदम उठाने के निर्देश दिए जाते हैं, ताकि विजय को गिरफ्तार करके सजा दिलवाई जाए। वहीं, संजीव एक अन्य मामले में अभी पुलिस कस्टडी में है। उसे कस्टडी से जेल भेजने के निर्देश दिए जाते हैं, जहां वह अपनी सजा काटेगा।
हाईकोर्ट ने कहा- हत्याएं नियोजित तरीके से
डेमो पिक
हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों में लंबे समय से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की वजह से दुश्मनी थी। विजय सिंह के मामले में तीनों गवाओं की गवाहियां पूरी तरह विश्वसनीय हैं। मेडिकल रिपोर्ट भी इसकी पुष्टि करती है।
फोरेंसिक जांच में भी यह पुष्टि हुई कि संजीव माहेश्वरी की पिस्टल से गोली चली। साक्ष्यों के आधार पर बिना हिचक कहा जाता सकता है कि निचली अदालत की फाइंडिंग्स सर्वथा उचित थी। दोनों अभियुक्तों ने मिलकर हमला किया और हत्याएं करके भाग गए। संजीव और विजय पर आरोप साबित हो चुके हैं। यह सब पूर्व नियोजित तरीके से की गई।
क्या है मामला
विजय सिंह
10 फरवरी 1997 को फर्रुखाबाद कोतवाली में रात 1.45 बजे सुधांशुदत्त द्विवेदी ने एफआईआर दर्ज कराई कि उनके चाचा ब्रह्मदत्त द्विवेदी, उनके गनर बृजकिशोर की विजय सिंह व तीन अन्य लोगों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर हत्या कर दी। ड्राइवर घायल हो गया।
मामला ट्रॉयल कोर्ट में पहुंचा, जहां सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर रोजाना सुनवाई हुई। सीबीआई जांच भी हुई। विजय को दो मार्च 1997 को दिल्ली में जबकि संजीव माहेश्वरी को 22 अप्रैल को मेरठ में गिरफ्तार कर लिया गया।
मामले में 67 लोगों ने गवाही दी। लखनऊ अतिरिक्त सेशन जज ने जुलाई 2003 को विधायक विजय सिंह और संजीव माहेश्वरी को उम्र कैद व पांच वर्ष कैद की दो सजाएं सुनाई।