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नोटबंदी के 50 दिन बाद: क्या कहती है जनता, देखें- ग्राउंड रिपोर्ट

Thu, 29 Dec 2016 07:17 PM IST
अजीत बिसारिया/अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : amar ujala
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नोटबंदी के पचास दिन। सैकड़ों मुश्किलें। हजारों कहानियां। शहर से लेकर गांव तक केवल नोटबंदी और उससे पैदा हुए हालात की ही चर्चा रही। लेकिन 50 दिन की मोहलत एक ऐसे डेडलाइन की तरह लोगों के दिलो दिगाम में छाया हुआ है जिसके पार लोग एक ऐसी व्यवस्था की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें बैंकों के कतार से निजात की उम्मीद तो जुड़ी ही है एक साफ सुथरी नई व्यवस्था की आस भी है।
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इस दरम्यान शादी का सीजन भी गुजर गया और फसलों की बुआई का दौर भी। क्या किसान, क्या व्यापारी और क्या मजदूर। नौकरी पेशा लोगों से लेकर नौजवानों-महिलाएं सबके पास हैं न जाने कितने किस्से है। और नकद की कमी के बीच जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहने के अनोखे अनुभव।

हमारे रिपोर्टर ने अवध क्षेत्र के कुछ गांवों कस्बों के दौरे कर लोगों की समस्याएं और उनकी उम्मीदें जानने की कोशिश की। पेश है ग्राउंड रिपोर्टी-

किसानों ने हाइब्रिड के बजाय परंपरागत बीजों से काम चलाया

फैजाबाद के गांव सि‌रसिंडा में अलाव तापते लाल बहादुर, संदीप, दिलीप। - फोटो : amar ujala
फैजाबाद के गांव सिरसिंडा के लाल बहादुर सिंह के पास 5 बीघा जमीन है। उन्होंने गेहूं की बोआई समय पर की। कैसे? जवाब था-हमनें इस बार हाइब्रिड के बजाय परंपरागत बीजों से ही काम चलाया। कुछ बीज हमारे पास था, वहीं कुछ साथी किसानों से ले लिया।

इसी गांव के राजमिस्त्री संदीप और दिलीप कुमार बताते हैं कि शुरुआती एक महीने में तो काफी दिक्कतें हुईं। न बैंक और एटीएम से पैसे मिल पा रहे थे और न ही काम करवाने वाले कुछ दे पा रहे थे। फैजाबाद शहर के बजाय हमने गांव के आसपास ही काम करना शुरू किया।

नकदी के बजाय जरूरत भर का खाने-पीने और दूसरी चीजों का इंतजाम हो गया। अब बैंकों से भी काम चलाने भर का पैसा मिल ही जा रहा है। मजदूर मायाराम भी ऐसी ही स्थिति बयां करते हैं।

 अलबत्ता ‘पूरा बाजार’ के किसान आशीष सिंह का कहना है कि नोटबंदी के चलते वे हाइब्रिड बीज नहीं खरीद पाए। इसलिए इस बार पहले की तरह अच्छी उपज नहीं मिल पाएगी।

कमाई घटी, पर नकली नोटों की समस्या होगी दूर

अयोध्या में टैंपो चालक राजीव यादव व विशाल गुप्ता। - फोटो : amar ujala
फैजाबाद शहर में एनआईसीटीई कम्प्यूटर सेंटर पर काम करने वाले आकाश सिंह और यूनाइटेड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के कर्मचारी मनोज पांडेय नोटबंदी को सरकार का अच्छा कदम बताते हुए कहते हैं कि इससे नकली नोटों की समस्या पर काफी हद तक लगाम लगेगी।

रही बात बैंकों से निकासी सीमा पर पाबंदी की तो जितने रुपये मिल रहे थे, वे मध्यवर्गीय लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी हैं।
अयोध्या के टेंपो चालक राजवीर यादव इससे इत्तफाक नहीं रखते। वे कहते हैं- मोदी सरकार ने आम आदमी की गाढ़ी कमाई को कालेधन की श्रेणी में रख दिया, वहीं उनके साथी टेंपो चालक विशाल गुप्ता इसे कालेधन पर करारी चोट बताते हैं।

हालांकि, दोनों का कहना था कि नोटबंदी के पहले महीने में उनकी कमाई 500 रुपये रोजाना से गिरकर 200-250 रुपये पर पहुंच गई थी। लेकिन अब धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो  रही है।

गांव का माल गांव में खपने से मिली राहत

अंबेडकरनगर के गांव शमशुद्दीनपुर में किसान दयाशंकर और विजय शंकर गोस्वामी व अन्य। - फोटो : amar ujala
अम्बेडकरनगर के गांव शमशुद्दीनपुर के किसान दयाशंकर और विजय शंकर गोस्वामी बताते हैं कि हर साल वे डीएपी ब्लैक में खरीदते थे, लेकिन पहली बार उन्हें इसका बैग निर्धारित कीमत 1050 रुपये में मिला। गांव में ही आलू 6 रुपये, मटर 10-15 रुपये और टमाटर 8-10 रुपये किलो मिल जा रहा है।

पिछले सीजन में यही मटर इन दिनों 35-40 रुपये प्रति किलोग्राम मिल रही थी। जब वे यह बात कह रहे थे, उसी वक्त एक छोटी मालवाहक गाड़ी उनके गांव में पहुंची, जिस पर सब्जी लदी हुई थी। वे कहते हैं कि नोटबंदी के बाद से गांव का माल गांव में ही खपाया जा रहा है, जिसका हर किसी को फायदा मिल रहा है।

ढाई बीघा खेत के मालिक अटवाई गांव के कृष्ण कुमार गुप्ता भी मानते हैं कि नोटबंदी से आम किसानों को कोई दिक्कत नहीं हुई। सबने भाई-बंधु की मदद से काम चला लिया। मंशापुर के किसान मनोज कुमार और मीरपुर के सत्येंद्र तिवारी कहते हैं कि बदलाव की बयार में थोड़ी-बहुत दिक्कतें तो सहन करनी ही पड़ती हैं।

अम्बेडकरनगर के जिला मुख्यालय अकबरपुर के पटेल नगर के रहने वाले युवा मनोज मिश्रा कहते हैं कि नोटबंदी के दौरान उनके यहां लोगों को जरूरत भर का पैसा बैंकों से मिल गया। अकबरपुर के ही सुभाष शुक्ला और संतोष मिश्रा कहते हैं कि आम आदमी तो हमेशा से लाइन में लगता ही आ रहा है। हमें पूरा यकीन है कि इस बार की लाइन देश के भविष्य को उज्ज्वल करेगी।

पुराने नोट से दोगुना देने पड़ रहे हैं दाम

सुल्तानपुर के पंडितपुरवा में अपनी समस्या बता रहीं किसान चंद्रावती, राजेश सिंह व अन्य। - फोटो : amar ujala
सुल्तानपुर के ग्राम सभा-गढ़ौली के गांव पंडित पुरवा की महिला किसान चंद्रावती धान की कम कीमत मिलने से बेहद खफा दिखीं। कहा-कैसे खाद और सिंचाई का इंतजाम होगा। नकदी की कमी के चलते आढ़त पर धान खरीदा नहीं जा रहा है, जबकि गांव में लोग 500-600 रुपये प्रति क्विंटल ही धान खरीद रहे हैं।

यहीं के किसान राजेश सिंह बताते हैं कि नए नोट पर धान 500-600 रुपये प्रति क्विंटल ही खरीदा जा रहा है, जबकि व्यापारी पुराने नोट लेने पर 1000 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से पेमेंट कर रहे हैं। पास के क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक से व्यापारियों को भी नकदी नहीं मिल पा रही है, नतीजतन यह स्थिति पैदा हुई है।

वहीं, राजेश कहते हैं कि जिस देश में अधिकांश लोग फोन कॉल को सिर्फ रिसीव करना जानते हैं, वहां कैशलेस व्यवस्था जल्दबाजी में लागू नहीं किया जाना चाहिए। गांव सैदपुर के मो. कौसर और मो. सलील नोटबंदी के फैसले को पूरी तरह से गलत बताते हैं। वे कहते हैं हैं-इसकी वजह से हमें मुंबई और दिल्ली से काम छोड़कर गांव लौटना पड़ा।

मो. अफसर और मो. साजिद भी कहते हैं कि उन्हें अब शहरों में मजदूरी नहीं मिल पा रही है। सुल्तानपुर शहर के प्रदीप शुक्ला एक निजी कंपनी में काम करते हैं। वे मानते हैं कि नोटबंदी से पूरे देश में लोगों को काफी दिक्कतें हुई हैं, पर देश हित में इसे खुशी-खुशी सहन करना चाहिए। निजी कंपनी में ही कार्यरत अरुणेंद्र उपाध्याय भी उनसे इत्तफाक रखते हैं।

बिक्री तो घटी, पर फैसला अच्छा

अमेठी के मुसाफिरखाना में टीवीएस बाइक की एजेंसी चलाने वाले रामलाल सिंह और उनके बेटे आशीष सिंह। - फोटो : amar ujala
अमेठी की तहसील मुसाफिरखाना के गांव शादीपुर के बांशिदे तो पूरी तरह से नोटबंदी के समर्थन में खड़े हैं। यहां के भरत कुमार सिंह पेशे से शिक्षक हैं। वे कहते हैं- हमारे यहां नोटबंदी से पहले ईंटों का दाम 7500 रुपये प्रति हजार था, जो अब घटकर 4500 रुपये हो चुका है। बिल्डिंग मैटेरियल सस्ता हो रहा है।

नकदी की कमी के कारण आढ़तिए सब्जी-फल का स्टॉक नहीं रख पा रहे हैं, नतीजतन गांव में ये चीजें उन्हें सस्ती मिल रही हैं। इसी गांव के पोस्टमैन सूर्यभान सिंह, अवधेश मिश्रा और अम्बरीश तिवारी भी भरत कुमार सिंह की हां में हां मिलाते हैं। उन्हें पूरी उम्मीद है कि दाम में गिरावट का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

बहराइच के गांव हुजूरपुर के किसान रवि तिवारी और एके मिश्रा कहते हैं कि उन्होंने समय से बोआई पूरी कर ली, क्योंकि उनके यहां के अधिकांश किसान हमेशा ही परंपरागत बीजों का ही इस्तेमाल करते हैं। नोटबंदी से उन्हें किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं हुई।

एक निजी स्कूल में पढ़ाने वाले रानी बाजार, गोंडा के रमेश चंद्र तिवारी मानते हैं कि नोटबंदी बिना तैयारियों के लागू कर दी गई, जिससे लोगों को परेशानी हुई।

शहरों में नहीं मिल पा रही पहले जैसी मजदूरी

बाराबंकी के गांव मानपुर में मजदूर रामप्रकाश व बाबादीन। - फोटो : amar ujala
बाराबंकी के गांव मानपुर के मजदूर रामप्रकाश कहते हैं कि नोटबंदी के बाद कारोबार ठप हो गए। ज्यादातर स्थानों पर चल रहे निर्माण कार्य रुक गए हैं, नतीजतन उनके जैसे मजदूरों को अब शहरों में पहले की तरह काम नहीं मिल पा रहा है।

इसी गांव के बाबादीन छोटे किसान तो है हीं, समारोहों के लिए बर्तन भी किराए पर देते हैं। वे मानते हैं कि नोटबंदी से निचले तबके को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। काम न मिलने से उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

बोआई तो उन्होंने समय से कर ली, मगर व्यवसाय पहले से आधा रह गया। बाराबंकी शहर की एक बैंक में कार्यरत आरके सिंह और पीके शर्मा कहते हैं कि नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा की गई पूरी की पूरी रकम को ‘सफेद’ मान लेना उचित नहीं है। जिन खातों में सामान्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा पैसा जमा हुआ, वो काला है या सफेद, ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा।

नोटबंदी ने किया धंधा चौपट

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गोलाघाट, सुल्तानपुर के ऑटो पार्ट्स कारोबारी रामदयाल मौर्य नोटबंदी पर बात छिड़ते ही बिलख कर रोने लगे। कहा, इसने कारोबार चौपट कर दिया। ऐसी मंदी जीवन में कभी नहीं देखी।

सब्जी और धान के रेट इतने नीचे चले गए हैं कि किसान भी रो रहा है। इससे कालाधन तो नहीं आया, आम आदमी और कारोबारी पर बुरी मार पड़ी है।

मोरंग-गिट्टी के सप्लायर सुल्तानपुर निवासी अशोक सिंह इसे मूर्खतापूर्ण कदम बताते हैं। उनकी पत्नी दिल की मरीज हैं। कहते हैं- इलाज के लिए पैसों का इंतजाम करने के लिए न जाने किस-किस के सामने हाथ फैलाना पड़ा।

नया ऑर्डर मिलना तो दूर, जिन्हें पहले माल पहुंचाया, वे भी पैसे देने की स्थिति में नहीं हैं। सुल्तानपुर के ही कॉन्ट्रैक्टर आशीष सिंह कहते हैं कि इससे 30-40 फीसदी कारोबार प्रभावित हुआ है।

कच्चा माल देने वाले तो कैश चाहते हैं

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रकाबगंज (फैजाबाद) के जूता व्यवसायी इरशाद अहमद आगरा से कच्चा माल खरीदकर लाते हैं। वे कहते हैं कि माल खरीदवाने वाले एजेंट अपना दो फीसदी कमीशन तो चेक से लेने को तैयार हैं, मगर कच्चा माल बेचने वाले पूरा पैसा नकद चाहते हैं। इसलिए इन पचास दिनों में उनका कारोबार पूरी तरह से ठप रहा है।

यहीं के मोटर पार्ट्स विक्रेता अंशु गुप्ता कहते हैं कि कारोबार एक-चौथाई भी नहीं रह गया। अकबरपुर के रहने वाले इलेक्ट्रिशियन आमिर बताते हैं कि इन 50 दिनों में उन्हें पहले के मुकाबले 10 फीसदी ऑर्डर भी नहीं मिले।

प्रॉपर्टी डीलर मो. अदनान और सिब्ते हारून ने भी ऐसी ही स्थिति बयां की। अकबरपुर के ही चाय विक्रेता कर्राज हुसैन बेहद गुस्से में दिखे। बोले-नोटबंदी से पहले गरीबों के बारे में तो सोचा होता।
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बैंकों में नकदी की किल्लत बरकरार, ध्यान दे सरकार

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पिछले कुछ दिनों में शहरों में बैंकों और एटीएम के बाहर लगने वाली लाइनें थोड़ी कम हुई हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है। अम्बेडकनगर के कटेहरी स्थित सेंट्रल बैंक के बाहर लंबी लाइन मिली।

लाइन में लगे रिटायर्ड रेलवेकर्मी शिव प्रसाद कहते हैं कि रुपये लेने के लिए चार बार लाइन में लग चुके हैं। हर बार जब हमारा नंबर आता है तो बैंक वाले या तो कैश देते ही नहीं या एक-दो हजार रुपये देकर टरका देते हैं।

चार घंटे से लाइन में लगे महमूद का भी कहना था कि सरकार बैंकों को पर्याप्त नकदी की आपूर्ति नहीं कर पा रही है। सुल्तानपुर की क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सैदपुर, चीनी मिल से भी नकदी न मिल पाने की लोगों ने शिकायत की।

सैदपुर के मो. चुन्नू बताते हैं कि चार दिन से चक्कर लगा रहे हैं, पर 10 हजार रुपये नहीं मिल सके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कमोबेश सभी जगहों पर लोगों ने बैंकों से कैश न मिलने की बात कही। उनका कहना था कि बैंक वाले चेहरा देखकर कैश दे रहे हैं। पहुंच वाले और रसूखदार लोगों को ही बैंकों से नकदी मिल पा रही है।
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