पूर्व मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा राज्य सरकार के गले की फांस बन गए हैं।
सियासी समीकरणों के उतार-चढ़ाव के कारण कभी मायावती के नवरत्नों में एक रहे कुशवाहा अब समाजवादी पार्टी की नाक के बाल बन गए हैं।
कुशवाहा पर बसपा शासनकाल के दौरान किए गए तमाम घोटालों के आरोप हैं। सरकार इन मामलों में उन्हें बचाने की हरसंभव कोशिश में जुटी है।
यही कारण है कि अदालत के आदेश पर शुरू हुई यूपीएसआईडीसी घोटाले की जांच तय सीमा में पूरी न कर उसकी फाइल को लेकर नूरा कुश्ती की जाती रही। कारण महज इतना सा था कि इस जांच में भी कुशवाहा फंस रहे थे।
सरकार का रवैया देखने के बाद अदालत ने जब अवमानना का नोटिस जारी करते हुए तत्कालीन प्रमुख सचिव गृह को तलब कर लिया, तब जाकर मजबूरी में जांच पूरी की गई।
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हालांकि एसआईटी द्वारा जांच कर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के लिए मांगी गई अनुमति पर फिलहाल विचार नहीं हो सका है।
इसके लिए भी अदालत ने एक माह भी अवधि निर्धारित की हुई थी, जो अब समाप्त होने को है। लिहाजा मजबूरी में सरकार ने इस प्रकरण पर विचार करने के लिए शुक्रवार को बैठक बुलाई है।
इस उच्चस्तरीय बैठक में एसआईटी की रिपोर्ट का अध्ययन होगा, जिसके बाद सरकार जांच एजेंसी को मुकदमा दर्ज करने के सिलसिले में अपना फैसला देगी।
विशेष सचिव गृह अरुण मिश्र ने स्वीकार किया कि शुक्रवार को इस प्रकरण पर विचार करने के लिए बैठक बुलाई गई है।
कुशवाहा से सरकार की नजदीकी की ताजा बानगी उनकी पत्नी को सपा द्वारा टिकट दिया जाना है।
वैसे कुशवाहा के खिलाफ विजिलेंस में चल रहे मामलों के साथ ही पुलिस को-ऑपरेटिव सेल की जांच भी ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी हो गई है।
हालांकि इस मामले में भी अदालत के सख्त रवैये की वजह से जांच एजेंसी को चार्जशीट लगानी पड़ गई थी।
लोकायुक्त की सिफारिश पर विजिलेंस ने राज्य सरकार के कहने पर पूर्व मंत्री के खिलाफ खुली जांच की थी।
जिसमें कुशवाहा को न सिर्फ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का बल्कि पद का दुरुपयोग कर सरकारी रकम की बंदरबांट करने, जमीन कब्जा करने और फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेने का आरोपी पाया था।
कुशवाहा के खिलाफ विजिलेंस ने तीन मुकदमे दर्ज करने की तैयारी की थी, लेकिन ऊपर से इशारा न मिलने के कारण यह संभव न हो सका था।
उल्टे राज्य सरकार ने पिछले दिनों पूर्व मंत्री की बेटी के प्रत्यावेदन पर उनके खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की तैयारी भी शुरू कर दी। इसके तहत सरकार ने विजिलेंस अधिकारियों को प्रत्यावेदन की जांच कर रिपोर्ट देने को निर्देश दिए हुए हैं।
लैकफेड घोटाले में भी माना था भ्रष्टाचार का आरोपी
ऐसे ही पुलिस को-ऑपरेटिव सेल ने कुशवाहा को लैकफेड घोटाले में सीधे तौर पर भ्रष्टाचार का आरोपी माना था।
उनके गृह जनपद बांदा में चार करोड़ रुपये की लागत से बनी सड़क में बड़े पैमाने पर हुई कमीशनबाजी में कुशवाहा का नाम सामने आया था।
जांच एजेंसी ने चार्जशीट में बताया था कि नियमों को ताक पर रख लैकफेड को कार्यदायी संस्था का दर्जा दिए जाने और फिर उसे विभिन्न विभागों द्वारा कई सौ करोड़ रुपये का काम देकर वारे-न्यारे किए जाने के खेल के पीछे भी तत्कालीन पंचायती राज मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा थे।
इसमें पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि (बीआरजीएफ) योजना का 143 करोड़ रुपये का काम देने के लिए पंचायती राज विभाग द्वारा लैकफेड को कार्यदायी संस्था नियुक्त करने का मामला भी शामिल था।
पुलिस को-ऑपरेटिव सेल कुशवाहा को रिमांड पर लेकर पूछताछ करना चाहती थी, पर उसे ऐसा करने से रोक दिया गया था।
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