साइकिल
वाले डॉक्टर साहब की जगह रातों रात राजधानी के मैदान में आए अपने प्रो.
साहब कद्दावर प्रत्याशी हैं।
इस मायने में कि उनकी कद-काठी अपनों के बीच भी
आला है और पार्टी में भी उनका कद ठीक-ठाक है। इन सबके बीच वे गली-मोहल्लों
में कभी ऑटो पर दौड़ लगा रहे हैं तो कभी स्कूटर या बाइक पर।
लेकिन नदी पार
वाले अपने इलाकों में बाहर-बाहर से ही घूम-फिर कर चले आ रहे हैं।
दरअसल
उनके इलाकों में बुनियादी दिक्कतों का ऐसा जाल बिछा पड़ा है कि प्रो. साहब
नहीं चाह रहे हैं कि जब वो घरों का दरवाजा खटखटाएं तो लोग वोट देने के
आश्वासन के बजाय उलाहना ही देने लगें।
इसीलिए इधर कुछ दिनों से उनके घर
(जीते हुए विधानसभा क्षेत्र) के इलाकों में कुछ इलाकों की सूरत-ए-हाल बदल
रही है। कहीं मरम्मत चल रही है तो कहीं नाले-नालियां साफ हो रही हैं।
अंदरखाने के उन्हीं के एक हमदर्द बताते हैं कि ऐसा इसलिए कि जब भइया घर
पहुंचें तो साफ सुथरे आंगन में उनका स्वागत हंसते हुए हो।