कुर्सी तो कुर्सी होती है। हर किसी की चाहत बड़ी कुर्सी की होती है। शिक्षा विभाग में चचा के नाम से पहचाने जाने वाले अफसर सब कुछ अपने हिसाब से ही करते थे।
सो वे जब रिटायर होने लगे तो अपने हिसाब से चार्ज देकर चले गए। हालांकि, सरकार ने अब स्थाई शिक्षा निदेशकों की तैनाती कर दी है।
लेकिन कार्यवाहक निदेशक बनने वाली एक मोहतरमा की खुमारी अब भी नहीं उतर पा रही है। जब से वे पुरानी कुर्सी पर भेजी गई हैं।
तब से उनका मन नहीं लग रहा है। पुराने दिनों की याद में खोई रहती हैं। मातहतों के बीच पुराने दिनों की ही चर्चा करती रहती हैं। चर्चा तो यह भी है कि वे नए साहब को हजम नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि कुर्सी चीज ही ऐसी है।