शहर के हॉकी ओलंपियन और रविंद्र के सीनियर रहे सैयद अली बताते हैं कि मैदान में मैच के दौरान हमारी जुगलबंदी देखते ही बनती थी। सेंटर हॉफ की पोजीशन से खेलने वाले रविंद्र का खेल बेजोड़ था। उनके टीम में होने से ही प्रतिंद्वद्वी टीम के खिलाड़ी परेशान हो जाते थे, क्योंकि गोल बनाने के लिए पास देने की कला में वह माहिर था। मेरे कई गोल उसने शानदार पास की बदौलत हुए। बतौर इंसान उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। स्टेट बैंक में साथ में काम के दौरान रविंद्र ने तमाम साथियों के लिए लोन लिया और उनका कर्जा सालों तक चुकाया।
1981 का यूरोप टूर यादगार : सुजीत कुमार
मैदान में स्किलफुल हॉकी में महारथ रखने वाले पाल साहब बाहर में मस्तमौला इंसान थे। दोस्तों के साथ उनका याराना देखते ही बनता था। मुझे 1981 का यूरोप और पाकिस्तान टूर हमेशा याद रहेगा, क्योंकि उस वक्त भारतीय टीम में मेरे और उनके अलावा मो. शाहिद और सैयद भाई शामिल थे। उस दौरान हम चारों ने मिलकर खूब मजे किए और बेहतरीन हॉकी खेली। आप विश्वास नहीं करोंगे कि परिवार और दोस्तों से बेहद लगाव के कारण उन्होंने कई बार इंडिया कैंप तक छोड़ दिया नहीं तो उनके खाते में कम से कम एक ओलंपिक और भी होता।
मेरे कई गोलों में रवींद्र का योगदान : सैयद अली
शहर के हॉकी ओलंपियन और रविंद्र के सीनियर रहे सैयद अली बताते हैं कि मैदान में मैच के दौरान हमारी जुगलबंदी देखते ही बनती थी। सेंटर हॉफ की पोजीशन से खेलने वाले रविंद्र का खेल बेजोड़ था। उनके टीम में होने से ही प्रतिंद्वद्वी टीम के खिलाड़ी परेशान हो जाते थे, क्योंकि गोल बनाने के लिए पास देने की कला में वह माहिर था। मेरे कई गोल उसने शानदार पास की बदौलत हुए। बतौर इंसान उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। स्टेट बैंक में साथ में काम के दौरान रविंद्र ने तमाम साथियों के लिए लोन लिया और उनका कर्जा सालों तक चुकाया।
मैदान में स्किलफुल हॉकी में महारथ रखने वाले पाल साहब बाहर में मस्तमौला इंसान थे। दोस्तों के साथ उनका याराना देखते ही बनता था। मुझे 1981 का यूरोप और पाकिस्तान टूर हमेशा याद रहेगा, क्योंकि उस वक्त भारतीय टीम में मेरे और उनके अलावा मो. शाहिद और सैयद भाई शामिल थे। उस दौरान हम चारों ने मिलकर खूब मजे किए और बेहतरीन हॉकी खेली। आप विश्वास नहीं करोंगे कि परिवार और दोस्तों से बेहद लगाव के कारण उन्होंने कई बार इंडिया कैंप तक छोड़ दिया नहीं तो उनके खाते में कम से कम एक ओलंपिक और भी होता।
खेलने के अलावा घूमने और सिनेमा देखने के शौकीन : महेंद्र बोरा
पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी महेंद्र बोरा कहते हैं कि रब्बू के साथ लंबा साथ रहा। मेरठ के बाद हमने लखनऊ हॉस्टल में सालों हॉकी खेली। उस वक्त कोलकाता में हम साथ में ही मोहन बगान हॉकी क्लब के लिए खेलने जाते थे। मैच और प्रैक्टिस के अलावा रब्बू भाई को घूमने और सिनेमा देखने का बहुत शौक था। जब भी समय मिला, हम साथ में शहर घूमने निकल जाते।
जूनियरों का खूब बढ़ाया उत्साह : आरपी सिंह
खेल निदेशक एवं पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी आरपी सिंह ने बताया कि अभी हाल में हॉकी इंडिया में मुझे हॉकी परफॉमेंस एंड डेवलपमेंट कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था। उस वक्त शहर के सभी हॉकी खिलाड़ियों ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। अमूमन पाल साहब ऐसे आयोजनों से परहेज करते थे, लेकिन मेरे एक बार अनुरोध करने पर वे तुरंत ही आ गए। कार्यक्रम में अपने संबोधन में उन्होंने अपनी शायरी से समां बांध दिया और समोराह में चार चांद लगा दिए।
सेंटर हाफ (मिडफील्डर)
वर्ष 1979 में जूनियर वर्ल्ड कप
वर्ष 1979 में चैंपियंस ट्रॉफी
वर्ष 1980 मास्को ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता टीम के सदस्य
वर्ष 1984 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में प्रतिभाग
वर्ष 1982 में वर्ल्ड कप