जेनरिक बनाम ब्रांडेड या पेटेंट दवा का असली खेल असल में 65 प्रतिशत मुनाफे के बंदरबांट की वजह से हैं।
10 लाख रुपये की कीमत की दवा पर करीब 6.5 लाख रुपये के अंतर में डॉक्टर, दवा निर्माता कंपनी के अलावा राजनीतिज्ञ, सरकारी अधिकारी और बिचौलिए तक शामिल हैं।
अपना हिस्सा तय करने के लिए डॉक्टर पर्चे पर जेनरिक दवा नहीं लिखते। राजधानी में जेनरिक दवा की बिक्री और कीमतों में कमी की लड़ाई लड़ रहे आरटीआई एक्टिविस्ट अशोक भार्गव के मुताबिक, ब्रांडेड दवा की बिक्री का पूरा गणित है।
पूर्व में खुद दवा व्यापारी रहे अशोक भार्गव ने बताया कि करीब 65 प्रतिशत दवा की कीमतों में औसतन वृद्धि कर बेची जाती है।
असल में जेनरिक और ब्रांडेड दवा में कोई अंतर नहीं होता। डॉक्टरों की मांग पर थोड़ा-बहुत बदलाव कर नई पैकिंग और नए नाम से इसे बाजार में उतार दिया जाता है।
कई साल्ट को मिलाकर बनाई गई दवा को पेटेंट ड्रग का नाम देकर भी कंपनियां बेचने का काम करती हैं।
इसमें करीब 14 बहुराष्ट्रीय कंपनियां देशभर में दवा के बाजार में काबिज हैं। सरकारी अस्पतालों से लेकर मेडिकल कॉलेज और निजी अस्पतालों में प्रिस्क्रिप्शन स्लिप से जेनरिक मेडिसिन गायब ही हैं।
ब्रांडेड बनाम जेनरिक का गणित
अशोक भार्गव के मुताबिक, ब्रांडेड दवा की एमआरपी अगर 10 लाख रुपये है। इसमें से 8.5 लाख की एक्चुअल बिलिंग होती है।
1.5 लाख रुपये इसमें से कैरी एंड फॉरवर्ड मद में दवा के मरीज तक पहुंचने में हुए खर्च के लिए रखे जाते हैं।
इस दवा को जेनरिक कैटेगरी में देखें तो यह दो लाख की एमआरपी में होती है। ऐसे में सीधे तौर पर करीब 6.5 लाख रुपये का अंतर हो जाता है।
इस मार्जिन के लिए ही दवा कंपनी, डॉक्टर, ड्रग कंट्रोल से जुड़े अधिकारी व बिचौलिए के बीच पूरा खेल होता है।
डॉक्टरों को इसमें मोटा कमीशन गिफ्ट या फिर क्लीनिक में अपडेशन के नाम पर पहुंचाया जाता है। इसके एवज में दवा के पर्चे पर ब्रांडेड दवाएं जगह ले लेती हैं।
एम्स की स्टडी में सामने आई हकीकत
डॉक्टरों द्वारा दवा के लिए लिखे पर्चे पर केवल 1.6 प्रतिशत ही जेनरिक दवा होती है। एसजीपीजीआई में हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन के सेमिनार में एम्स की एक स्टडी में यह बात सामने आई।
स्टडी करने वाले डॉ. वी सिद्धार्थ का कहना है कि जेनरिक दवाओं पर डॉक्टर भरोसा ही नहीं दिखा रहे। उनके मुताबिक, ब्रांडेड दवाएं बीमारी में ज्यादा असरदार होती हैं।