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लोक गायिका पद्मश्री शारदा सिन्हा ने कहा-लोक को सिर्फ कंठ से नहीं, नृत्य और अभिनय से भी सींचा

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लखनऊ। गायिकी में ठुमरी की ठसक और कजरी के छीटों के साथ-साथ, हर धुन पर निकलते बोल में नृत्य जैसी लचक , लोक से जुड़ जाने और उसे खुद से जोड़ लेने वाली भाव भंगिमाएं यूं ही नहीं हैं। संगीत जगत का जाना माना नाम पद्मश्री शारदा सिन्हा अपने आप में लोक गायिकी का एक स्कूल हैं। राजधानी के लिए मंगलवार का दिन खास था, जब लोक गायिकी का पर्याय बन चुकीं शारदा सिन्हा लखनऊ पहुंचीं। वे यहां सोन चिरैया के आमंत्रण पर आई हैं, क्योंकि उन्हें 2022 के लोक निर्मला सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। नाम के अनुरूप, वे बनी तो संगीत के लिए हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब नृत्य और गायन दोनों में वे पारंगत हो रही थीं। अभिनय की बारीकियां भी अच्छे से जानती हैं। गायिका न होतीं तो वे नृत्यांगना होतीं और अभिनय करते भी उन्हें देखा सकता था। व्यक्तिगत जीवन से जुड़े इन्हीं खास पहलुओं, स्त्री संघर्ष और युवा पीढ़ी को लेकर उन्होंने अमर उजाला से बात की।
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पिता के संकल्प के बल पर संघर्षों की अग्नि में तपीं
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पिता कहा कहते थे कि जो आता है, सीखा है, उसे विकसित होने का मौका मिलना चाहिए। हर सामाजिक बुराई को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने मेरे लिए अवसर तलाशे, मुझे अपने मन की इच्छा पूरी करने की आजादी दी। उन्हें कभी इस बात चिंता नहीं थी कि लोग क्या कहेंगे। मेरा प्रोग्राम देखकर जाने वाले पीठ पीछे कहते कि ठाकुर की लड़की को मंच पर गाना नहीं चाहिए। पिता का जवाब होता था कि कहने दो, आगे बढ़ो। दरअसल छोटेपन में मैं कविता किया करती थी और उसे गाती थी। पिता ने सुना तो उन्हें लगा कि मेरे इस शौक को दिशा मिलनी चाहिए और घर पर ही शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की। शिक्षक आते 10-15 दिन अस्थायी प्रवास करते और फिर चले जाते। इसी सिलसिले के साथ हम सीखते हुए आगे बढ़ते रहे।
बैलगाड़ी से इंटरनेट की दुनिया तक
उन्होंने कहा कि जहां तक स्त्री संघर्ष की बात है तो वह आज भी संघर्ष जारी है और रहेगा। हमने वो दौर देखा है जब बैलगाड़ी तक पहुंचने के लिए पहले हमें कई पैदल चलकर आना होता था। साधन सीमित थे, आज इंटरनेट को शिक्षक मान लोग सीख रहे, रिकॉर्ड कर रहे और गा रहे हैं। लोक गीत शाश्वत है, पर संवर्द्धन जरूरी है। बीच में कुछ समय के लिए गिरावट आई थी, लेकिन इसकी प्रतिष्ठा स्थायी है। नई पीढ़ी प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रही है और भरोसा है कि वो नए प्रयोगों के साथ लोक की पहचान को कायम रखेगी।
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बिहार का माहौल देख गायन को चुना, वरना नृत्यांगना होती
उन्होंने कहा कि बाबूजी की प्रेरणा पर हमने नृत्य भी सीखा। भारतीय नृत्य कला मंदिर में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन के समक्ष मणिपुरी और नागा डांस करने का मौका मिला। नृत्य और गायन में से विधा चुनने की बारी आई तो लगा कि नृत्य से ठहराव नहीं आएगा, क्योंकि बिहार का माहौल चुनौतीपूर्ण था। तय किया कि गायन ही चुनूंगी और लोक कला के लिए काम करूंगी। मेरी संगीत यात्रा की रिकॉर्डिंग का पहला अध्याय लखनऊ शहर से शुरू हुआ था। वह दौर था, जब मल्लिका-ए-गजल बेगम अख्तर ने मुझे अपने आशीर्वाद से नवाजा था।
एसएनए में राज्यपाल करेंगी सम्मानित
साक्षात्कार में मौजूद सोनचिरैया की सचिव व लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने बताया कि हर साल सोनचिरैया की ओर से लोक निर्मला सम्मान दिया जा रहा है। इसी कड़ी में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल बुधवार को संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे लॉन में लोक कला के संरक्षण व संवर्द्धन के लिए शारदा सिन्हा को सम्मानित करेंगी। समारोह 6.30 बजे शाम से शुरू होगा। इससे पहले यह सम्मान वर्ष 2021 में पद्मश्री गुलाबो सपेरा को दिया गया था।
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