अब बात सियासत की। भाजपा का 14 वर्ष का सत्ता का वनवास 2017 में खत्म हुआ। विधानसभा में 312 सीटें अगर भाजपा ला सकी तो इसमें किसानों की कर्जमाफी के वादे का बड़ा योगदान रहा। लोकसभा चुनाव में भी 49.6 फीसदी वोट शेयर भाजपाने हासिल किए तो इसका भी बहुत हद तक श्रेय किसानों को जाता है। यह सब तब था जबकि किसानों का पूरा कर्ज माफ किए जाने के बजाय एक-एक लाख रुपये ही माफ हुए। 6000 रुपये सालाना सम्मान निधि भी किसानों को रास आई। सिंचाई परियोजनाओं सहित कई अधूरी परियोजनाएं पूरी हुई हैं। पर, तीन कृषि कानूनों को लेकर किसान आंदोलन ने जिस तरह से सियासत को गरमाया, उसका असर चुनावी समीकरणों पर तो पड़ेगा ही।
आय बढ़ी लेकिन चुनौती और बढ़ी
अब बात किसानों के मुद्दों की। किसानों के मन की। गोंडा के प्रगतिशील किसान आशीष सिंह कहते हैं, पिछले पांच वर्षों में किसानों के लिए कई सकारात्मक पहल हुई। किसान सम्मान निधि शुरू की गई। वर्षों से कई अधूरी नहरें पूरी की गईं हैं, जिससे सिंचाई में सहूलियत बढ़ी है। कृषक उत्पादक समूह (एफपीओ) बनाकर किसानों को प्रोत्साहन दिया गया है। आपदा राहत की मदद सीधे खाते में पहुंच रही है। कृषि उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहन देना शुरू किया गया है। बेशक इन सबसे किसानों की आय भी कुछ बढ़ी है। पर, किसानों के सामने चुनौती उससे बड़े अनुपात में बढ़ गई है। रामपुर के कृषक उद्यमी अमित वर्मा कहते हैं, खाद-बीज की कीमतें बढ़ने के साथ ही अब कहीं ज्यादा मजदूरी चुकानी पड़ रही है।
छुट्टा पशुओं का डर: फसल बचाने के लिए बाड़बंदी पर छमाही खर्च हो रहे 10 हजार तक
गोरखपुर में कृषक उत्पादक समूह का संचालन कर रहे किसान महेंद्र प्रताप यादव कहते हैं, लालफीताशाही वाली नीति से सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद छुट्टा जानवरों से फसलों के नुकसान की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। हर छमाही 8-10 हजार रुपये फसलों की बाड़बंदी का खर्चा बढ़ गया है।
जो खर्च नहीं कर पाते, उनकी फसल चौपट हो जाती है। पराली की समस्या का लाभप्रद समाधान संभव है, लेकिन उस ओर ध्यान नहीं दिया जाता। उल्टा किसान इसके लिए उत्पीड़न को मजबूर होता है। चुनावों में किसानों की इन समस्याओं पर न तो कोई चर्चा कर रहा है और न ही समाधान बता रहा है। कोविड काल मे उद्योगों, कारोबारियों को कई सहूलियतें दी गईं, किसान को क्या मदद मिली? फसल बचाने में लगने वाली बाड़ के खर्चे में सरकार को मदद करनी चाहिए।
भुगतान में देरी पर ब्याज क्यों नहीं?
बागपत के प्रगतिशील किसान धर्मेंद्र तोमर बताते हैं, समय से गन्ना मूल्य के भुगतान में विफल रहने पर ब्याज अदायगी का नियम है। क्या कभी तय समय सीमा में भुगतान होता है? फिर सरकार मिलों से ब्याज क्यों नहीं दिलाती? तय अनुपात से ज्यादा गन्ना का उत्पादन हो जाए, तो बिकना मुश्किल। युवा किसान अरविंद तिवारी सवाल उठाते हैं, यदि अनाज, फूल व फल आसानी से बिकेगा नहीं, पूरी कीमत मिलेगी नहीं, तो किसान का भला होगा कैसे? खेत से स्थानीय मंडी व मार्केट के बीच दो से आठ गुना तक कीमत में अंतर रहता है। यह खाईं पाटे बिना किसान की तरक्की संभव नहीं है।
किसानों की आय बढ़ी तो कर्ज भी बढ़ा
एनएसएस का सिचुएशन एसेसमेंट सर्वे बताता है कि 2013 से 2019 के बीच किसानों की आय में वृद्धि हुई तो उनके कर्ज में भी भी इजाफा हुआ है। छह वर्षों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर किसान परिवारों की सालाना आमदनी में औसतन 22,932 रुपये की बढ़ोतरी हुई, जबकि यूपी में यह वृद्धि 14,484 रुपये
तक सीमित रही। इसी अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर किसानों के औसत कर्ज में 27,121 रुपये की वृद्धि हुई, हालांकि यूपी के किसानों पर कर्ज का बोझ 23,807 रुपये ही बढ़ा। यूपी में औसत कर्ज में कमी के पीछे योगी सरकार के एक लाख रुपये तक की कर्जमाफी को भी माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने 6000
रुपये किसान सम्मान निधि भी देने की शुरुआत की।
किसानों की समस्याएं और समाधान के फॉर्मूले
- फसल की पड़ताल कागज की जगह जमीन पर हो : फसलों से संबंधित ज्यादातर आंकड़े अनुमान पर आधारित हैं। लेखपालों के पास इतना काम है कि वे अपने इस मूल काम में सिर्फ कोरम पूरा करते हैं। खसरा पड़ताल अवधि में लेखपालों से कोई दूसरा काम न लिया जाए।
- पंचायतों को सौंपा जाए गोसेवा केंद्रों का संचालन : छुट्टा गोवंश किसानों के लिए मुसीबत बने हैं। बुंदेलखंड में अन्ना पशुओं की बड़ी समस्या है। छुट्टा गोवंश संरक्षण का काम नौ विभागों को सौंप दिया गया, जबकि यह काम ग्राम पंचायतों का है। गो-संरक्षण केंद्रों को डेयरी केंद्र के रूप में विकसित कर लाभकारी बनाया जाए।
- धान खरीद की जगह चावल खरीद की हो शुरुआत : सरकार एमएसपी पर धान खरीदती है। पर, इसमें क्या-क्या खेल होते हैं, किसी से छिपा नहीं है। किसान एमएसपी पर चावल खरीद को स्थायी समाधान का विकल्प बताते हैं। किसान के पास मानक का जितना चावल होगा, छन्ना निकाल लेगा। बाकी चावल किसान अपने उपयोग में ले आएगा या बाजार में बेच लेगा। स्थानीय स्तर पर चावल तैयार करने के लिए मशीनें लगेंगी जिससे स्थायी तौर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
- स्थानीय इकाइयों में कृषि स्नातकों के लिए सुरक्षित हों अवसर : कृषि की पढ़ाई करने वाले बेरोजगार युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर इसी क्षेत्र में जुड़े रोजगार बढ़ाने के प्रयास किए जाएं। जिले के कृषि स्नातकों के लिए नौकरी के स्थान आरक्षित किए जाएं।
- ब्याज मिले तो नियमित हो गन्ना मूल्य भुगतान : किसानों को समय से भुगतान एक स्थायी मुद्दा बन चुका है। नियम है कि 14 दिन के अंदर भुगतान हो जाना चाहिए, वरन ब्याज देना पड़ेगा। लेकिन यह प्रावधान आज तक लागू नहीं हो पाया। यदि यह व्यवस्था लागू हो जाए तो भुगतान नियमित हो जाएगा।
- एफपीओ का सरकारीकरण चिंताजनक, व्यवस्था में हो सुधार : छोटे व मझोले किसानों की तरक्की के लिए कृषक उत्पादक समूहों (एफपीओ) के गठन की पहल हुई है। नीति के बाद जारी ज्यादातर आदेश कागजी हैं। समूह बनाने वालों को नहीं पता कि एफपीओ सेल में कौन-कौन है? सेल कहां है? सेल का संपर्क नंबर क्या है? वहीं, कागजी कार्यवाही इतनी बढ़ाई जा रही है कि किसान खेती करे या कागजों में सिर खपाए। कृषि निर्यात नीति आई, पर आधे से ज्यादा जिलों में इससे जुड़े अधिकारी नहीं हैं। कार्यालय तक नहीं हैं। ऐसे में समस्याओं के समाधान के लिए किसान कहां जाएं?
- बाढ़ प्रभावित किसानों को स्थायी मदद का इंतजार : हर वर्ष लाखों किसान बाढ़ जैसी स्थायी आपदा का सामना करते हैं। बाढ़ में इन्हें घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी पड़ती है और सरकारी इमदाद की राह ताकनी पड़ती है। तमाम घर दूसरे-तीसरे वर्ष गिर जाते हैं। बाढ़ का नियमित सामना करने वाले गांवों को स्थायी रूप से पुनर्वासित करने की योजना पर सरकार को गंभीर रूप से काम करना चाहिए। राज्य आपदा मोचक निधि की बढ़ी धनराशि इसमें मददगार हो सकती है।