मेरी डेढ़ साल की एक पोती है। जब भी टीवी पर लुंगी डांस गाना आता है तो रुक जाती है और मटकने लगती है। अब उसे समझ में भी नहीं आता होगा कि गाने में क्या बोला जा रहा है। यही हाल हमारे दर्शकों का है।
उनके थिरक ने को ही फिल्म निर्माता हिट सॉन्ग मान लेते हैं। बुधवार को दादा साहब फाल्के अवार्ड विजेता और मशहूर गीतकार योगेश गौड़ ने ये बातें नए जमाने में गीतों में आ रहे बदलाव पर कही।
मूलरूप से लखनऊ निवासी योगेश गौड़ श्रीरामस्वरूप मेमोरियल कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट में आयोजित अपने सम्मान में आयोजित संगीत संध्या में मौजूद थे।
उन्होंने कहा कि आज की फिल्मों और गीतों पर बाजारवाद हावी हो गया है। निर्देशक से ज्यादा फिल्म का निर्माता महत्वपूर्ण हो चुका है।
निर्माता का लगता है कि आइटम सॉन्ग और लुंगी डांस जैसे गाने ही हिट हैं। दर्शक भी ऐसे गानों पर जोर नहीं देता। गानों में संवेदनाएं पूरी तरह आदमी से दूर हो चुकी हैं।
सही शब्दों में कहा जाए तो श्रोता की संगीत की भूख शांत करने के लिए आज के गाने फास्ट फूड की तरह हो गए हैं। मौजूदा गीतकारों के बारे में उनका कहना था कि मुझे ऐसा कोई नजर नहीं आता जोकि अर्थपूर्ण गाने लिख रहा हो।
अब तो एफएम और टीवी ने भी गीतकारों के नाम दिखाने बंद कर दिए हैं।
मुझे याद नहीं आता कि समीर के बाद कोई ऐसा गीतकार सामने आया हो। आज के गीतकारों की हालत यह है कि आशिकी-2 का एक गाना ‘सुन रहा है ना तू’ काफी पॉपुलर हुआ।
अब इस गाने के बोल का अर्थ निकालें तो कुछ भी नहीं निकलता है।
नहीं लिखे जाते विदाई के गाने
पुराने गीतों की याद में डूबे योगेश गौड़ का कहना था कि आज के समय में विदाई के गाने नहीं लिखे जाते। मुझे अच्छी तरह याद है कि विदाई का गाना बाबुल की दुआएं लेती जा, आज भी शादियों में गाया जाता है। इस गाने पर आज भी आंसू रुक नहीं पाते। बहुत दिनों के बाद आमिर खान की फिल्म तारे जमीं पर के मां जैसा अच्छा गाना सुनने को मिला।
फिर सुनाई देगा जादू
योगेश गौड़ ने बताया कि नवंबर में एक फिल्म ऐसी दीवानगी रिलीज हो रही है। इसमें उनके लिखे गाने गाए जाएंगे। इनमें से कुछ गाने लखनऊ के ही निवासी और भातखंडे यूनिवर्सिटी के सतेंद्र त्रिपाठी ने गाए हैं।