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पश्चिमी यूपी: जानें, हिंसा के पीछे का राजनीतिक सच

Tue, 12 Aug 2014 08:58 AM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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मीडिया की सुर्खियों में आया मुरादाबाद जिले के कांठ क्षेत्र का अकबरपुर चैदरी गांव दलित-मुस्लिमों के बीच तनाव का पहला मामला नहीं है।
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पिछले ढाई महीने में छह सौ से ज्यादा सांप्रदायिक तनाव की वारदातों में करीब 70 मामलों में दलित और मुस्लिम आमने-सामने आए। इनमें दो तिहाई घटनाएं वेस्ट यूपी की हैं।

विधानसभा उपचुनाव वाले क्षेत्रों या उनके नजदीकी इलाकों में सांप्रदायिक तनाव के ज्यादा मामले आ रहे हैं। वेस्ट यूपी में छोटी-छोटी बातों पर सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं हो रही हैं।
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देश के बंटवारे के समय और रामजन्म जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के समय सहिष्णुता दिखाने वाले पश्चिमी जिलों के देहात के इलाके अब गैरजरूरी मुद्दों पर टकराने को तैयार बैठे हैं।
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इन छोटे-छोटे मामलों पर भिड़ रहे लोग

यह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन बानगी के तौर बताना जरूरी है कि किस तरह के मामले भाईचारे को संकट में डाल रहे हैं। बागपत जिले के बड़ौत में पट्टी चौधरान में 27 मई को कथित तौर पर एक व्यक्ति दूसरे समुदाय के व्यक्ति के होटल का बिल नहीं चुकाता है तो दो समुदायों के लोग आमने-सामने आ जाते है।

11 जून को बागपत के शौकत मार्केट में अलग-अलग समुदायों के लोगों की मोटरसाइकिल और आटो रिक्शा भिड़ने पर दो पक्षों के बीच टकराव हो जाता है।

18 जून को मेरठ जिले के सरधना क्षेत्र के खिर्वा नौआबाद गांव में नहर में नहाने पर विवाद हो जाता है तो 29 जून को मवाना कस्बे में धर्मस्थल के निकट बारिश में नहाने के मुद्दे पर दो पक्षों में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बन जाती है।

मुजफ्फरनगर में सार्वजनिक तालाब में एक पक्ष के बच्चों के नहाते समय दूसरे संप्रदाय के व्यक्ति द्वारा भैंसों को छोड़ने पर भिड़ंत हो जाती है।

सामाजिक ध्रुवीकरण की हुई शुरुआत

अवध, पूर्वांचल, तराई और बुंदेलखंड में भी ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं लेकिन पश्चिमी यूपी की तरह नहीं। कहीं बाग से आम तोड़ने, कहीं धीमी आवाज में बैंड बजाने, खेत में बकरी के चर लेने और कहीं पेड़ की टहनी काटने जैसे मुद्दों ने भी सांप्रदायिक तनाव के हालात पैदा किए।

बलात्कार, जमीन पर कब्जे, लाउडस्पीकर और छेड़छाड़ जैसे मुद्दे तो गंभीर घटना का सबब बन ही रहे हैं। वेस्ट यूपी में मुसलमानों के बाद आबादी के लिहाज के दलितों का नंबर है।

कांठ में दलितों के मंदिरों से लाउडस्पीकर उतारने के मामले ने इतना तूल पकड़ा कि कई दिनों तक पश्चिमी यूपी गरमाया रहा। आठ दिन से ज्यादा कांठ के बाजार बंद रहे। पंचायत के ऐलान के बाद भाजपा समर्थकों और प्रशासन में ऐसा टकराव हुआ कि अब भी दर्जनों भाजपाई जेल में हैं।

पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम विवाद की यह पहली बड़ी घटना जरूर थी लेकिन सियासी दलों ने सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए इसकी शुरुआत पहले ही कर दी थी। इसे बसपा की सोशल इंजीनियरिंग पर हमला भी कहा जा सकता है।

दलितों के रक्षक के रूप में नाकाम बसपा

आमतौर पर बसपा वेस्ट यूपी में दलित-मुस्लिम समीकरण का प्रयोग करती रही है लेकिन भाजपा नेताओं ने दलितों के ‘रक्षक’ के रूप में उसे नाकाम बनाना शुरू कर दिया है।

शायद यही वजह है कि ढाई महीने में दलित-मुस्लिम सांप्रदायिक तनाव के करीब 70 मामले सामने आ चुके हैं। इनमें दो तिहाई मामले वेस्ट यूपी के हैं। खासतौर से उन क्षेत्रों या उनके आसपास के जहां भविष्य में विधानसभा उपचुनाव होने हैं।

लखीमपुर और पीलीभीत जिलों में दलित युवती से रेप के बाद हत्या या आत्महत्या के मामलों से गरमाहट रही। हरदोई में तो कब्रिस्तान के निकट खोदाई में शिवलिंग की आकृति से मिलता जुलता पत्थर निकलने के बाद वहीं पूजा शुरू कर देने पर दलितों-मुस्लिमों के बीच हिंसक झड़पें हुईं।

सहारनपुर में दिखा असर

सहारनपुर में 25 जुलाई को दंगा हुआ तो वहां इससे पहले हुईं सामाजिक तनाव की घटनाओं का असर दिखा। सिखों के साथ मुस्लिमों के संघर्ष की शुरुआती घटना के बाद एक पक्ष के दंगाइयों में सर्वाधिक तादाद दलितों की है।

हिंसा व आगजनी की आधी घटनाएं दलित और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हुईं। यानी मुस्लिमों के मुकाबिल दलित फ्रंट पर दिखे। दलित जनभावनाओं को समझने वाले मेरठ कैंट बोर्ड के सदस्य और फोटो जर्नलिस्ट जगमोहन शाकाल कहते हैं कि वेस्ट यूपी राजनीति की प्रयोगशाला बन गया है।

लोकसभा चुनाव से पहले हुए मुजफ्फरनगर दंगे के असर से भाजपा खासी उत्साहित है। पहले जाट बनाम मुस्लिम, फिर मुस्लिम बनाम दलित की कोशिश और अब सिख बनाम मुस्लिम। मतलब साफ है, नजर 2017 पर है।

भाजपा आक्रामक है। अजित सिंह का आधार समेटने के बाद भाजपा के निशाने पर बसपा का वोट बैंक है। सपा सरकार का रवैया ढुलमुल है और सपाई बेबस।

दलित वोटों के जरिये सत्ता चाहती है भाजपा

दलित सरोकारों से जुड़े मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व महामंत्री डॉ. रवि प्रकाश दलित और मुस्लिमों के बीच ऐसी घटनाओं को राजनीति से जोड़कर देखते हैं।

कहते हैं- जो भाजपा हरियाणा में दलित उत्पीड़न के चर्चित मामलों गोहाना, मिर्चीपुर और भगाना कांड पर चुप्पी साधे रहती है उसे पश्चिमी यूपी में दलितों की चिंता हो रही है। भाजपा नेता उनके मामले उठा रहे हैं। वजह साफ है, प्रदेश के दलितों में आमतौर पर सपा विरोधी भावना है।

कांग्रेस बैकफुट पर चली गई है और बसपा नेता आंदोलनों से दूर रहते हैं, वे अपने वोटर की हिफाजत करने में नाकाम रहे हैं। इन हालात में भाजपा दलितों को जोड़ने की अच्छी संभावना देख रही है। दलित-मुसलमान टकराव की बढ़ती घटनाओं को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।

भाजपा, बसपा से दलित बेस वोट छीनना चाहती है। उसकी नजर दलित वोटों के जरिये 2017 के विधानसभा चुनाव में सत्ता हथियाने पर है। यूं भी सत्ता पक्ष (सपा) को दलितों की ज्यादा चिंता नहीं है। भाजपा नेता दलितों के पक्ष में खड़े हो रहे हैं तो उनकी हमदर्दी भी मिलेगी।

दलितों के सम्मान पर ठेस से बढ़ी घटनाएं

दलितमुद्दों पर सक्रिय रहने वाले मेरठ कॉलेज, मेरठ के प्राध्यापक डॉ. सतीश प्रकाश का कहना है कि पश्चिमी यूपी में दलितों-मुस्लिमों के बीच तनाव बढ़ने के पीछे सामाजिक कारण हैं। पश्चिमी जिलों में कनवर्टेड मुस्लिम ज्यादा है।

मुस्लिमों में सामाजिक दबदबा और जमीनों का रकबा उन्हीं जातियों का ज्यादा है जिन जातियों का हिंदुओं में है। दलितों के प्रति उनके व्यवहार का तरीका भी लगभग एक जैसा ही है। शिक्षा और जागरूकता बढ़ने से पश्चिमी यूपी की प्रभावशाली हिंदू जातियों में दलितों के प्रति सोच बदली है।

लेकिन अशिक्षा के चलते कुछ मुस्लिम अब भी सौ साल पुरानी सोच पर कायम हैं। सामाजिक चेतना बढ़ जाने के बाद वेस्ट यूपी का दलित, सम्मान पर ठेस बर्दाश्त नहीं करता। कई जगह मुस्लिम उनसे गरिमा के प्रतिकूल व्यवहार करते हैं। इससे टकराव पनपता है। खासतौर से रेप जैसे मामले काफी संवेदनशील हैं, वे तनाव का कारण बनते हैं।
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जरूरी नहीं कि भाजपा को सफलता मिले

पश्चिमी यूपी हो रही सांप्रदायिक वारदातों पर वरिष्ठ अधिवक्ता तौसीफ अली खां का कहना है कि ‘पिछले दो-ढाई महीने से वेस्ट यूपी के माहौल को सांप्रदायिक बनाने की योजनाबद्ध तरीके से कोशिशें हो रही हैं। इसकी शुरुआत तो पिछले साल मुजफ्फरनगर दंगे से ही हो गई थी।

भाजपा की रणनीतिक लाइन है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके चुनावी लाभ लिया जाए। वह लोकसभा चुनाव में इसका सफल प्रयोग कर चुकी है। चूंकि दलित, आबादी का बड़ा हिस्सा है, इसलिए उन्हें बसपा के प्रभाव से मुक्त करने के लिए भाजपा लगातार काम कर रही है।

माहौल को भड़काना और फिर दलितों के पक्ष में खड़े होने का संदेश देकर भाजपा उनमें पैठ बढ़ा रही है। आम लोग अभी इसे समझ नहीं रहे हैं, इसलिए इस्तेमाल हो रहे हैं। यह फिनोमना लंबे समय तक नहीं चल पाएगा।'
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