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'घर जमाई होना दहेज लोभी न होने की गारंटी नहीं'

Mon, 10 Aug 2015 01:43 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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किसी के घर-जमाई होने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि वह या उसके माता-पिता दहेज लोभी नहीं हैं। साक्ष्य देखकर जज चार्ज फ्रेम कर सकते हैं। अदालत ने साफ कहा कि केवल इस आधार पर माता-पिता को दहेज के आरोपों से बरी नहीं किया जा सकता कि उनका बेटा घर जमाई है।
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दहेज मांगने के आरोपी सर्वेश शाह ने हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर अपने माता-पिता को इन आरोपों से मुक्त करने की गुजारिश की थी।

उनकी दलील थी कि चूंकि वह शादी के बाद से अपने ससुर के घर में रहते हैं इसलिए उनके माता-पिता पर इस तरह के आरोप लगाना गैर वाजिब है। मामले कि सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आदित्य नाथ मित्तल ने कहा कि ऐसे में अदालत जब चार्ज तय करेगी तो एफआईआर में दर्ज आरोपों को ही आधार नहीं बनाएगी।

जस्टिस मित्तल ने स्पष्ट किया कि चार्जफ्रेम करते समय अदालत से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि मौजूदा साक्ष्यों का गहराई से परीक्षण करे। उन्होंने कहा कि अदालत अगर मुतमईन है कि आरोप तय करने के पर्याप्त आधार हैं तो वह चार्ज फ्रेम कर सकती है। इस दौरान बचाव पक्ष द्वारा खुद को फंसाए जाने या रंजिशन आरोप लगाए जाने जैसे तर्कों पर भी विचार करने की जरूरत नहीं है, उन पर आगे ट्रायल की प्रोसिडिंग में विचार किया जा सकता है।
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यहां देखें, यह है पूरा मामला

विवाह के बाद सर्वेश शाह ससुराल में रहने लगा। लेकिन दहेज की मांग के चलते यह विवाह संबंध बिगड़ गया। लड़की पक्ष ने लड़के और उसके माता-पिता पर दहेज मांगने का मुकदमा कर दिया।

लखनऊ सेशंस कोर्ट में सर्वेश ने तर्क रखा कि वह घर जमाई रहा है, इसलिए उसके माता-पिता पर दहेज लोभी होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता, उन्हें आरोपों से बरी किया जाए। लेकिन अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 12 जून को अपने निर्णय में इस तर्क को नकार दिया। इस पर आरोपी सर्वेश शाह ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दाखिल किया। जिसे हाईकोर्ट ने भी खारिज कर दिया।

केवल इन चार स्थितियों में आरोपी को रिहा कर सकते हैं जज
1. प्रस्तुत किए गए साक्ष्य नाकाफी हों।
2. आरोपी पर कानूनी कार्रवाई का कोई कानूनी आधार न हो।
3. जहां अभियोजन साफ तौर पर सीमा से बंधा हो।
4. हाईकोर्ट के पूर्व में दिए निर्णय में उस पर कार्रवाई रोकी गई हो।
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