किसी के घर-जमाई होने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि वह या उसके माता-पिता दहेज लोभी नहीं हैं। साक्ष्य देखकर जज चार्ज फ्रेम कर सकते हैं। अदालत ने साफ कहा कि केवल इस आधार पर माता-पिता को दहेज के आरोपों से बरी नहीं किया जा सकता कि उनका बेटा घर जमाई है।
दहेज मांगने के आरोपी सर्वेश शाह ने हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर अपने माता-पिता को इन आरोपों से मुक्त करने की गुजारिश की थी।
उनकी दलील थी कि चूंकि वह शादी के बाद से अपने ससुर के घर में रहते हैं इसलिए उनके माता-पिता पर इस तरह के आरोप लगाना गैर वाजिब है। मामले कि सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आदित्य नाथ मित्तल ने कहा कि ऐसे में अदालत जब चार्ज तय करेगी तो एफआईआर में दर्ज आरोपों को ही आधार नहीं बनाएगी।
जस्टिस मित्तल ने स्पष्ट किया कि चार्जफ्रेम करते समय अदालत से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि मौजूदा साक्ष्यों का गहराई से परीक्षण करे। उन्होंने कहा कि अदालत अगर मुतमईन है कि आरोप तय करने के पर्याप्त आधार हैं तो वह चार्ज फ्रेम कर सकती है। इस दौरान बचाव पक्ष द्वारा खुद को फंसाए जाने या रंजिशन आरोप लगाए जाने जैसे तर्कों पर भी विचार करने की जरूरत नहीं है, उन पर आगे ट्रायल की प्रोसिडिंग में विचार किया जा सकता है।