एक जमाने पर राजीव गांधी के करीबी बाद में राजनीतिक दुश्मन हुए वीपी सिंह से अब कांग्रेस को बैर नहीं है। यह बदली हुए राजनीतिक समीकरणों की वजह से हो रहा है। मामला तमिलनाडु से जुड़ा हुआ है। चेन्नई में 27 नवंबर को पूर्व पीएम वीपी सिंह की प्रतिमा का अनावरण बदले राजनीतिक समीकरणों का भी अहसास कराएगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का विरोध करते हुए जो शख्स सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा, अब कांग्रेस को उससे भी कोई परहेज नहीं है। इसे ओबीसी राजनीति को लेकर कांग्रेस के बदले रुख का नतीजा माना जा रहा है। तमिलनाडु सरकार के इस कार्यक्रम में कांग्रेस के नेता भी शामिल होंगे, जबकि अखिलेश यादव विशिष्ट अतिथि होंगे।
तमिलनाडु के सीएम और डीएमके नेता एमके स्टालिन चेन्नई में प्रेसीडेंसी कॉलेज में वीपी सिंह की प्रतिमा लगवा रहे हैं। स्टालिन का कहना है कि देश में सामाजिक न्याय की लड़ाई को वीपी सिंह ने एक मुकाम पर पहुंचाया था। इसलिए ऐसी शख्सियत को सम्मानित करना और याद रखना हम सबका कर्तव्य है। स्टालिन ने वीपी सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल में तमिलनाडु में किए गए कार्यों को भी उल्लेखनीय बताया।
एक राजनेता के तौर पर देखें तो वीपी सिंह की राजनीतिक सफर का 1990 के दशक में ही अवसान हो गया था। लेकिन, कांग्रेस उनको लेकर लंबे समय तक सहज नहीं रही। इसकी मुख्य वजह थी कि उन्होंने ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मिस्टर क्लीन की छवि पर बोफोर्स सौदे में दलाली का आरोप लगा सवाल उठाए थे। प्रधानमंत्री बनने पर वीपी सिंह ने 1990 में 10 साल से लटकीं मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया, तो राजीव गांधी ने इसे ''कैन ऑफ वॉर्म (जटिल समस्याओं का पिटारा)'' बता दूर रहने की नसीहत दी थी।
मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर ही ओबीसी जातियों को 27 फीसदी आरक्षण मिल सका था। उसके बाद केंद्र में कांग्रेस सरकारों ने तीन कार्यकाल पूरे किए, पर ओबीसी जनगणना पर उसका रुख कभी सकारात्मक नहीं रहा। इधर, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे सार्वजनिक मंचों से लगातार एलान कर रहे हैं कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर जातीय गणना कराई जाएगी, ताकि ओबीसी जातियों को उनका वाजिब हक मिल सके।
कांग्रेस के लिए जरूरी हैं ओबीसी
ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के सदस्य और तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष पॉन कृष्णमूर्ति बताते हैं कि उन्हें वीपी सिंह की प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए निमंत्रण मिला है और वह इसमें शामिल भी होंगे। जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रो. आनंद कुमार कहते हैं कि देश की समकालीन परिस्थितियों में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचने के लिए ओबीसी राजनीति का ही सहारा लग रहा है। इसलिए सामाजिक न्याय के मसीहा माने जाने वाले वीपी सिंह को लेकर न तो अब वह कोई विपरीत रुख रखना चाहती है और न ही इसकी अब कोई प्रासंगिकता या जरूरत बची है। इसके उलट ओबीसी को केंद्र में रखकर राजनीति करने वाले दलों के लिए वीपी सिंह का नाम आगे बढ़ाना मुफीद ही साबित होगा।
राष्ट्रीय राजनीति में कदम बढ़ाना चाहते हैं स्टालिन
रुहेलखंड विवि के बरेली कॉलेज में तैनात राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर डॉ. वंदना शर्मा कहती हैं कि 9 लोकसभा सीटों वाली भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) राष्ट्रीय राजनीति में कदम रख चुकी है, तो 24 सीटों वाली डीएमके भी पीछे नहीं रहना चाहती। वह भी राष्ट्रीय फलक पर प्रभाव छोड़ना चाहती है। डीएमके सदैव से आरक्षित वर्ग की राजनीति करती रही है, ऐसे में स्टालिन को अपने राज्य में आरक्षित वर्ग को संगठित रखने के लिए जहां वीपी सिंह का नाम मुफीद लग रहा है, वहीं उत्तर भारत में भी यह एक संदेश देना का काम करेगा।
दबाव समूह के प्रतीक होंगे वीपी सिंह
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इंडिया गठबंधन के अंदर लोकसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक समीकरण ही कुछ इस तरह के बन रहे हैं कि डीएमके, बीआरएस और सपा को एक-दूसरे से नजदीकियां बढ़ाने में लाभ दिख रहा है। क्षेत्रीय शक्तियां एक दबाव समूह भी बनाए रखना चाहती हैं, ताकि चुनाव के दौरान और भविष्य में स्थितियां बदलने पर कांग्रेस से सौदेबाजी करने में सुविधा हो। इसके तहत ही डीएमके वीपी सिंह जैसे राजनीतिक प्रतीकों को आगे रख रही है। अब यह बात दीगर है कि नवंबर 1990 में जब वीपी सिंह सरकार गिरी तो सपा के तत्कालीन सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव उनके बजाय वीपी सिंह के धुर प्रतिद्वंद्वी चंद्रशेखर के साथ आ गए। उनके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर पीएम बने।
वीपी सिंह की पत्नी और बेटों को भी निमंत्रण
तमिलनाडु के मुख्य सचिव शिव दास मीना की ओर से जारी कार्यक्रम के कार्ड (आमंत्रण) में सबसे ऊपर अखिलेश यादव का नाम है, उसके नीचे एमके स्टालिन का नाम है। आधिकारिक आमंत्रण पत्र के अनुसार, अध्यक्षीय भाषण स्वर्गीय वीपी सिंह की पत्नी सीता कुमार का रहेगा, जबकि उनके बेटों अजेय सिंह और अभय सिंह को भी आमंत्रित किया गया है।