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चिंता का सबब: डीएपी के दाम में 300 रुपये की वृद्धि, निजी कंपनियों ने बढ़ाया मूल्य, इफको 31 मार्च के बाद लेगी निर्णय

Wed, 24 Mar 2021 08:45 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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खाद (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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डीएपी के दाम में अचानक वृद्धि ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। निजी कंपनियों ने 50 किग्रा के बैग की कीमत 300 रुपये बढ़ा दी है। अभी तक डीएपी के 50 किग्रा के एक बैग की कीमत 1200 रुपये थे। निजी क्षेत्र की पारादीप फॉस्फेट लिमिटेड (पीपीएल) और गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर्स कॉर्पोरेशन (जीएसएफसी) ने इसका प्रिंट रेट 1500 रुपये कर दिया है।

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पुराना स्टॉक उपलब्ध होने के कारण इफको ने अभी रेट नहीं बढ़ाए हैं। हालांकि उसके अधिकारियों का कहना है कि 31 मार्च के बाद उन्हें भी इस बाबत कोई निर्णय लेना पड़ेगा। इफको के स्टेट मैनेजर अभिमन्यु राय ने बताया कि नया स्टॉक आने पर निर्णय लिया जाएगा। फिर भी इसका रेट अन्य कंपनियों के मुकाबले कम होगा। कृषि विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, अभी यूपी के बाजार में 3.62 लाख मीट्रिक टन डीएपी उपलब्ध है। अधिकारियों का कहना है कि इसमें से बमुश्किल 20 हजार मीट्रिक टन डीएपी ही नए प्रिंट रेट की है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा माल महंगा होने से बढ़े डीएपी के दाम
प्रदेश के कृषि विभाग के अधिकारी बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीएपी में इस्तेमाल होने वाले फॉस्फोरिक एसिड और रॉक फॉस्फेट की कीमत चढ़ने से यह परिस्थितियां पैदा हुई हैं। देश में इसकी उपलब्धता काफी कम है। इसलिए ये दोनों उत्पाद बाहर से मंगाए जाते हैं।
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अब डीएपी की मुख्य मांग जून-जुलाई में खरीफ की फसलों की बोआई-रोपाई के दौरान होगी। इस समय गन्ना, मूंग, मेंथा और सब्जियों की फसलों में ही डीएपी की जरूरत है, जोकि बहुत अधिक नहीं होती है। इस कारण रेट बढ़ने पर भी किसी तरह का पैनिक नहीं फैल रहा है। पुराने स्टॉक से ही काम चल जा रहा है। यूपी में खरीफ सीजन में डीएपी की आपूर्ति का लक्ष्य औसतन 12 लाख मीट्रिक टन का रहता है। इसलिए खरीफ सीजन में बड़ी मात्रा में नए रेट की डीएपी इस्तेमाल करनी पड़ेगी।

एनपीके से फसलों को मिलते हैं संतुलित तत्व
फॉस्फेटिक फर्टिलाइजर्स के रूप में बाजार में डीएपी, एनपीके और एसएसपी (सिंगल सुपर फॉस्फेट) उपलब्ध है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल के रेट बढ़ने से यहां भी डीएपी के दाम में वृद्धि हुई है। एनपीके भी एक अच्छा विकल्प है, जिससे फसलों को संतुलित फॉस्फेटिक तत्व मिल जाते हैं।
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-अनिल पाठक, संयुक्त निदेशक, कृषि

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