विवाह समारोह में आया एक किशोर खुशी में हो रही फायरिंग का शिकार हो गया। उसके सिर में 44 छर्रे धंसे हैं।
यही नहीं घायल धर्मेंद्र की जान बचाने के लिए उसके पिता इलाज की आस में राजधानी पहुंचे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर की चिकित्सा सुविधाओं का दम भरने वाले अस्पतालों ने उसे दुत्कार दिया।
घर वालों की नादानी और डॉक्टरों की लापरवाही से अब जहां धर्मेंद्र की आंखें जाने का खतरा है। वहीं समय पर इलाज न मिलने से उसका दिमाग भी प्रभावित हो सकता है।
सुल्तानपुर के बाहरौली गांव के गया प्रसाद का बेटा धर्मेंद्र (15) आठ फरवरी को एक विवाह समारोह में गया था। जहां यह हादसा हो गया।
धर्मेंद्र को जिला अस्पताल ले जाया गया जहां से डॉक्टरों ने उसे केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया।
आंख में पट्टी बांधकर भेजा ओपीडी
9 फरवरी की रात धमेंद्र को ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। एक्स-रे जांच में पता चला किया गोली के छर्रे उसके सिर और आंख में धंसे हुए हैं।
इसके बाद डॉक्टरों ने धर्मेंद्र की आंख पर पट्टी बांधकर उसे अगले दिन ओपीडी में दिखाने की सलाह दे दी।
गया प्रसाद बताते हैं कि 10 फरवरी ओपीडी में डॉक्टरों ने सब कुछ नॉर्मल बताकर उसे बलरामपुर अस्पताल ले जाने की सलाह दी।
गया प्रसाद बच्चे को लेकर बलरामपुर अस्पताल पहुंचे तो इमरजेंसी में डॉक्टर एक्स-रे रिपोर्ट देखकर दंग रह गए।
जांच में पता चला कि बच्चे का कॉर्निया डैमेज हो चुका है और इलाज में देरी हुई तो आंख की रोशनी भी जा सकती है।
इमरजेंसी में भी नहीं मिला इलाज
इमरजेंसी में डॉक्टरों ने इलाज करने के बजाय अगले दिन बुधवार को धर्मेंद्र को केजीएमयू भेज दिया। ट्रॉमा पहुंचा तो ओपीडी भेज दिया और ओपीडी पहुंचने पर वहां बैठे डॉक्टर ने बलरामपुर अस्पताल जाने की सलाह दी।
एक अस्पताल से दूसरे की भागदौड़ के बाद परिवारीजन बच्चे को ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराने की आस में बैठे रहे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
बृहस्पतिवार सुबह दोबारा ट्रॉमा सेंटर और नेत्र रोग विभाग की ओपीडी पहुंचे तो बिना इलाज ही धर्मेंद्र को बलरामपुर भेज दिया गया।
दोपहर दो बजे नाजुक हालत में वहां की इमरजेंसी पहुंचे तो डॉक्टरों ने भर्ती तो कर लिया, लेकिन परिवारीजनों को ये साफ कर दिया कि बच्चे का इलाज यहां संभव नहीं है।
इमरजेंसी में तैनात ईएनटी डॉक्टर ने पत्र लिखकर बच्चे को केजीएमयू में भर्ती करने को कहा है। डॉक्टर का कहना है कि क्रिटिकल सर्जरी से आंख में धंसे छर्रे निकालने की सुविधा अस्पताल के पास नहीं है।