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उड़ने से पहले ही 'गद्दारों' के पर कतर देती हैं माया

Wed, 31 Dec 2014 10:32 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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लोकसभा चुनाव के बाद सियासी फिजा बदली तो बसपा के कई नेताओं के तार दूसरे दलों से जुड़ने लगे। हाईकमान ने इस अंदेशे में अब तक करीब आधा दर्जन प्रमुख नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया है। इनमें पूरब से लेकर पश्चिम तक के पूर्व सांसद व पूर्व विधायक जैसे लोग शामिल हैं।
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चर्चा है कि अगले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कई और नेता भाजपा के बड़े नेताओं के संपर्क में हैं। ऐसे में बसपा ऐसे नेताओं को दल छोड़ने से पहले ही निष्कासित करने की अपनी नीति पर कायम रह सकती है।

पहले विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर होने का दंश। फिर लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने की हकीकत। इसके बाद सूबे में विधानसभा उपचुनाव के लिए आजमाई गई रणनीति की जगहंसाई। रही सही कसर दूसरे राज्यों में पहले से भी बदतर प्रदर्शन ने पूरी कर दी।
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ऐसे में कहीं से भी अच्छी खबर न आने की बेचैनी ने कई बसपा नेताओं की नींद उड़ा दी है। सियासी दल विधानसभा चुनाव 2017 की तैयारियों को लेकर जैसे-जैसे संजीदा हो रहे हैं, अपने भविष्य को लेकर परेशान बसपाई भी दूसरे दलों से संपर्क बढ़ाने लगे हैं। इनमें सपा व भाजपा के बड़े नेताओं से तार जोड़ने वालों की तादाद ज्यादा है।

सूत्रों का कहना है कि पूर्व राज्यसभा सदस्य अखिलेश दास हों या पूर्व मंत्री राकेश धर त्रिपाठी, पूर्व सांसद दारा सिंह चौहान हों या कादिर राणा, सभी अन्य शिकायतों के अलावा दूसरे दलों के संपर्क के अंदेशे में ही बाहर किए गए। कई और बसपा नेताओं के भी दूसरे दलों के संपर्क में होने की चर्चा है।

दल छोड़कर जाने का मौका नहीं देती बसपा

बसपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार लोग लोभ में दल छोड़ते हैं। जब ऐसे नेता किसी दूसरे दल में जाते हैं तो उन्हें ज्यादा भाव मिलता है। लेकिन जब वे निष्कासित किए जाते हैं तो उन्हें उतना महत्व नहीं मिलता। बसपा किसी को भी दल छोड़कर जाने का मौका नहीं देती।

पार्टी को जैसे ही पार्टी विरोधी गतिविधि या अनुशासनहीनता की भनक लगती है, उस नेता की विभिन्न स्तर पर छानबीन कराई जाती है। जब तक वह सतर्क हो, कार्रवाई हो जाती है।

वह बताते हैं कि पूर्व सांसद विजय बहादुर सिंह ने लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के समर्थन में बयान बाद में दिया, पार्टी ने उनका टिकट पहले ही काट दिया था।

इसके अलावा जिस नेता का कॅरिअर ही राजनीति हो वह जिस दल में है वहां की जिम्मेदारी व कामकाज में निष्क्रिय दिखने लगे, तो यह समझने में मुश्किल नहीं होती कि क्या वजह हो सकती है? कोई दूसरे दलों से संपर्क बढ़ाता है, संभावनाएं तलाशता है तो आज कहीं छिपा थोड़े रह जाता है।
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इनका कट चुका है पत्ता

दारा सिंह चौहान- पिछली लोकसभा में बसपा संसदीय दल के नेता जैसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2014 का चुनाव हार गए।

अखिलेश दास - राज्यसभा के सदस्य रहे। मायावती ने कार्यकाल पूरा होने के चंद दिन पहले पार्टी से निकाल दिया।
कादिर राणा - मुजफ्फरनगर से बसपा सांसद रहे। पिछला लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन हार गए।

शाहिद एखलाक - बसपा से मेरठ के सांसद व मेयर रहे हैं। पिछला लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन जीत नहीं सके।
राकेश धर त्रिपाठी, पूर्व मंत्री- मायावती सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रहे। दूसरी बार बसपा में आए थे। पिछला लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन हार गए।

श्रीनाथ एडवोकेट, पूर्व कोऑर्डिनेटर- बसपा से एमएलसी रहे हैं। देवरिया के साथ-साथ पूर्वांचल में दलितों के बीच ठीकठाक प्रभाव माना जाता है।

वारिश अली- बहराइच जिले के नानपारा से पूर्व विधायक रहे। मुसलमानों में अच्छी पकड़ मानी जाती है।
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