इलाज दौरान ही दोपहर करीब 12 बजे मरीज की मौत हो गई। तीमारदार राम विलास ने बताया कि समय रहते ही उपचार मिलता तो शायद जान बच सकती थी। उनका कहना है कि वह मामले की शिकायत स्वास्थ्य मंत्री से करेंगे।
बलरामपुर अस्पताल के ईएमओ डॉ विष्णु देव का कहना है कि महीज की हालत अति गंभीर थी। उसे सांस लेने में भी तकलीफ थी। मरीज को वेंटिलेटर स्पोर्ट की जरूरत थी। ऐसे में मरीज सरकारी अस्पताल की बजाय उसे केजीएमयू में भर्ती लिया जाना था। जहां डॉक्टरों ने बेड खाली न होने की बात कहकर वापस कर दिया। आठ घंटे तक भटकने से मरीज की हालत और भी बिगड़ गई, जिससे उसकी मौत हो गई।
डॉक्टरों का कहना है ब्रेन स्ट्रोक पड़ने पर शुरुआती छह घंटे अहम होते हैं। इसमें अस्पताल पहुंचने पर उपचार शुरू हो जाए तो काफी हद तक मरीज को कवर किया जा सकता है। ब्रेन स्ट्रोक का अटैक पड़ने पर दिमाग की कोशिकाएं मरने लगती हैैं। इसमें मरीज को विकलांगता या मौत दोनों हो सकती है।
बेड खाली नहीं होने पर दूसरे संस्थान भेजते हैं
बेड खाली नहीं होने पर मरीजों को दूसरे बडे चिकित्सकीय संस्थानों में उपचार के लिए भेजा जाता है। ट्रॉमा सेंटर में मरीजों का बहुत लोड है। यहां हर रोज करीब 300 से अधिक मरीज उपचार के लिए आते हैं । - डॉ संतोष कुमार, प्रवक्ता, केजीएमयू