दरअसल, किसान आंदोलन की आंच गांव-गांव पहुंचने और उसके असर को भाजपा के रणनीतिकार या तो ठीक से भांप नहीं सके या फिर इसकी गंभीरता का सही ढंग से आकलन नहीं कर सके। रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि संगठनात्मक अभियान और सरकारी कार्यक्रमों के जरिये ग्रामीण मतदाताओं को अपने पाले में खड़ा करने कामयाब होंगे लेकिन यह आकलन गलत साबित हुआ। रही-सही कसर परिवार वालों के टिकट न मिलने से नाराज सांसदों, विधायकों, पदाधिकारियों व अन्य बड़े नेताओं ने पूरी कर दी।
पंचायत चुनाव में फतह को लेकर पूरी तरह आश्वस्त रणनीतिकारों ने समय रहते न तो ग्रामीण मतदाताओं की नब्ज टटोलने की जरूरत समझी और न ही पार्टी नेताओं की नाराजगी दूर करने की पहल। तमाम जिलों में स्थानीय स्तर पर कोरोना के प्रबंधन में नाकामी ने भी भाजपा को नुकसान पहुंचाया।
इसका नतीजा यह हुआ कि परिवारीजन को टिकट नहीं मिलने से खफा पार्टी के नेताओं ने अपने करीबियों को पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारकर चुनाव हराया। चुनाव रणनीतिकारों ने कोरोना की वजह से कार्यकर्ताओं में फैले को असंतोष को भी नजरअंदाज कर दिया। पश्चिम में किसानों की नाराजगी को भी एक समुदाय विशेष की नाराजगी मानने की गलती कर बैठे।
चुनाव में जिस प्रकार प्रत्येक वार्ड में युवा, किसान, महिला, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग के सम्मेलन कराने, जनसंपर्क व बूथ प्रबंधन की योजना बनाई थी, वह भी धरातल पर कामयाब नहीं रही। अलबत्ता प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने करीब एक महीने तक अलग-अलग जिलों का दौरा कर पंचायत चुनाव के लिए बैठकें और सम्मेलन करते रहे। विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को पंचायत चुनाव में हुए नुकसान के लिए पार्टी के अंदर अब रणनीतिकारों को ही जिम्मेदार माना जा रहा है।