कोरोना काल में विभिन्न कार्यक्रमों के जरिये भाजपा यह संदेश देने में कामयाब रही कि सत्ता में होने के बावजूद दुख व कठिन समय में वह जनता के साथ खड़ी है। दूसरी ओर विपक्ष न सिर्फ बिखरा हुआ है, बल्कि अभी तक वह सरकार के विरुद्ध कोई मुद्दा नहीं बना पाया है।
राजनीतिक व आर्थिक विश्लेषक प्रो. एपी तिवारी भी कहते हैं कि संगठनात्मक ढांचा की दिक्कत हो या कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता अथवा अन्य कोई कारण, लेकिन विपक्ष केंद्र व प्रदेश सरकार के किसी फैसले के विरोध में अभी तक टिकाऊ व जनता को उद्वेलित करने वाला माहौल नहीं बना पाया है। ऊपर से विपक्ष जिन कुछ मुद्दों को लेकर भाजपा पर हमला बोल रहा है, उससे सत्तारूढ़ दल को नुकसान तो दूर उल्टे फायदा मिलने की ज्यादा संभावना है।
जबकि भाजपा ने विपक्ष पर लगातार इसी बात को लेकर हमला किया जा रहा है कि कोरोना काल के दौरान विपक्ष ने बयानबाजी के अलावा कुछ नहीं किया है। विपक्ष भाजपा के इस आरोप की काट करते नहीं दिख रहा है। उल्टे उसके फैसलों से खुद यह संदेश चला जा रहा है कि उसे सिर्फ वर्ष 2022 के चुनाव की चिंता है।
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने अलग-अलग मुद्दों पर सरकार का विरोध किया, लेकिन वह सिर्फ एक-दो दिन ही चर्चा में रह पाया। यही नहीं आंतकी घटनाओं, धर्मांतरण व लव जिहाद पर विपक्ष के नेताओं के बयानों ने राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा के छवि को और मजबूत कर दी।
भाजपा को विपक्ष की कमजोरियां पता है। इसलिए पार्टी के रणनीतिकारों ने कार्यसमिति के जरिए योगी सरकार बनने के बाद प्रदेश में भाजपा की स्थिरता और हर बूथ पर 60 प्रतिशत से ज्यादा वोट जुटाने का मिशन लेकर आए अमित शाह के एजेंडे को आगे बढ़ा दिया है।
शाह ने सपा व बसपा मुक्त बूथ का नारा दिया है। पार्टी के रणनीतिकार विपक्ष को संभलने का मौका देने से पहले ही उस पर फिर आक्रमण कर देना चाहते हैं। इसके लिए कार्यसमिति ने जन प्रतिनिधियों से लेकर कार्यकर्ताओं तक को चुनाव तक लगातार जनता के बीच रखने का खाका खींच लिया है।