पिछले सात-आठ महीने से दंगों को लेकर सुर्खियों में रहे पश्चिमी यूपी में पहले चरण में रिकॉर्डतोड़ वोटिंग बड़े उलटफेर का संकेत दे रही है।
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बृहस्पतिवार को जिन 10 सीटों पर वोट डाले गए उनमें इस बार बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक आधार पर वोटरों का ध्रुवीकरण हुआ है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसका फायदा सीधे तौर पर भाजपा को मिलता दिख रहा है। सहारनपुर को छोड़कर ज्यादातर सीटों पर सपा-बसपा के बीच मुस्लिम मतों का बंटवारा होने से भी भाजपा को लाभ मिला है।
हालांकि सहारनपुर में मुसलमानों का झुकाव कांग्रेस की तरफ ज्यादा दिखा। मुस्लिम मतों के बंटवारे के चलते कांग्रेस-रालोद गठबंधन बागपत को छोड़कर अन्य सीटों पर मुकाबले से बाहर माना जा रहा है।
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बदजुबानी से बंटे वोट
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद हो रहे पहले चुनाव में पश्चिमी यूपी की 10 सीटों पर 65 फीसदी से ज्यादा मतदान से भाजपा की बांछें खिल गई हैं।
पश्चिमी यूपी की सियासी नब्ज समझने वालों का मानना है कि हिंदू और मुसलमान मतदाता किसी पार्टी या उम्मीदवार के लिए मतदान करने के बजाय एक-दूसरे को हराने के लिए वोट कर रहे थे।
भाजपा के पक्ष में जहां हिंदू वोटरों का स्वाभाविक ध्रुवीकरण था वहीं ज्यादातर सीटों पर मुस्लिम मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के बीच बंट गए।
भाजपा के अमित शाह और सपा के मो. आजम खां जैसे नेताओं के बीच छिड़ी जुबानी जंग ने भी वोटों के ध्रुवीकरण में अहम भूमिका निभाई।
वोटों के जबर्दस्त ध्रुवीकरण में बसपा जैसी पार्टी भी अपने दलित वोट बैंक पूरी तरह सहेजकर नहीं रख सकी।
उसका भी कुछ वोट भाजपा में गया है। माहौल देखकर जाट और ओबीसी वोटरों का एक खेमा भाजपा के पाले में खड़ा हो गया।
भाजपा को हमेशा से मिला फायदा
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार जितने मुस्लिम मतदाता वोटिंग के लिए निकले उतने ही हिंदू भी।
1991,1996 तथा 1998 में भी भाजपा को दंगा प्रभावित मुजफ्फरनगर में ध्रुवीकरण का फायदा मिला था।
सांप्रदायिक उभार ठंडा पड़ने पर 1999, 2004 और 2009 में भाजपा को इस क्षेत्र में हार का मुंह देखना पड़ा। सहारनपुर में पहली बार सबसे ज्यादा 73.43 % वोटिंग हुई।
1991 में सहारनपुर में 63.47 % मतदान के बावजूद भाजपा हार गई। इसके बाद 1996 में 59.17 % वोटिंग पर भाजपा ने सहारनपुर की सीट जीत ली।
1998 में फिर यह सीट भाजपा को मिली। इसी तरह कैराना, बिजनौर, मेरठ, अलीगढ़, बुलंदशहर संसदीय सीटों पर भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का असर रहा। इन सीटों पर बदलाव के आसार नजर आ रहे हैं।
सीटें 10, दावा 25 जीतने का
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सिर्फ 10 सीटों पर बृहस्पतिवार को चुनाव हुए हैं लेकिन राजनीतिक दल 25 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं।
भाजपा सभी 10 सीटें अपनी झोली में आने का दावा कर रही है तो सपा पांच सीटें मिलने का दम भर रही है। बसपा का कहना है कि पिछली बार इस इलाके से उसके पास पांच सीटें थीं।
इस बार और बढ़ने जा रही हैं। यानी बसपा भी छह सात सीट की उम्मीद लगाए हुए है। राष्ट्रीय लोकदल चार सीट जीतने का दावा कर रही है।
अलबत्ता कांग्रेस ने संख्या को लेकर कोई दावा नहीं किया है। उसका कहना है कि कांग्रेस की यहां अधिक से अधिक सीटें आएंगी।
भाजपा की लहर नहीं प्रतिक्रियात्मक वोटिंग
चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के उर्दू विभाग के हेड डॉ. असलम जमशेदपुरी का कहना है कि जैसा प्रचार किया जा रहा था कि मोदी की लहर है, वैसा कुछ भी नहीं दिखाई दिया।
पहले चरण के मतदान में प्रतिक्रियात्मक वोटिंग जरूर नजर आई। ज्यादातर सीटों पर भाजपा के मुकाबले सपा-बसपा लड़ते नजर आए। मुस्लिम वोट इन दोनों के बीच बंटे हैं जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता नजर आ रहा है।
दलितों का वोट जहां बसपा को गया है वहीं कुछ वोट भाजपा को भी मिला है। बागपत में सपा के मुस्लिम प्रत्याशी ने रालोद के चौ. अजित सिंह को काफी नुकसान पहुंचाया है।
मेरठ व मुजफ्फरगर में मुस्लिम वोटरों का झुकाव बसपा की तरफ रहा लेकिन कई जगह सपा भी मुस्लिमों का वोट खींचने में सफल रही है। कुल मिलाकर मुस्लिम मतों के विभाजन से भाजपा फायदे में पहुंच गई।
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अशोक शास्त्री का कहना है कि डेमोक्रेसी जिस तरह से चल रही है उसे लेकर लोगों में निराशा है।
जहां तक मतों के ध्रुवीकरण का प्रश्न है तो इसकी स्थानीय वजहें हैं। यूपी के मतदाता दो साल पहले बड़े जोर-शोर से मुलायम और अखिलेश को लाए थे लेकिन अब उन्हीं की आलोचना कर रहे हैं।
आम मतदाताओं में किसी भी दल के प्रति सकारात्मक नजरिया नहीं है। न ही पार्टियों की कोई सकारात्मक सोच नजर आ रही है।
फिलहाल वोटिंग ट्रेंड को देखते हुए ज्यादातर जगहों पर भाजपा को ही बढ़त मिलती दिख रही है।