प्रसिद्ध संतूर वादक भजन सोपोरी कहते हैं कि संतूर को कश्मीर का लोक वाद्य नहीं, सूफी वाद्य कहा जाना चाहिए। वास्तव में इसे लोक वाद्य कहना इसके महत्व को कमतर कर आंकने जैसा है। सूफी गायन में संतूर के अपने ठाठ रहे हैं। सूफी कलाकारों के दल में सितार वादक तो कई हो सकते हैं लेकिन संतूर वादक एक ही होता रहा है और वही दल का नायक भी होता है।
भजन सोपोरी इन दिनों लखनऊ में हैं। उन्होंने शुक्रवार और शनिवार को नगर के विभिन्न विद्यालयों में जाकर छात्र-छात्राओं के बीच व्याख्यान प्रदर्शन किए। स्पिक मैके संस्था ने सोपोरी के कार्यक्रमों के साथ वापसी की है।
शनिवार को रामस्वरूप मेमोरियल पब्लिक स्कूल और राजकुमार अकादमी में तो इसके पहले शुक्रवार को जयपुरिया और ला-मार्टीनियर बॉयज में कार्यक्रम किए। वे रविवार को प्रतापगढ़ जाएंगे। इन कार्यक्रमों में उनके साथ उनकी शिष्या वीथिका टिक्कू भी थीं जो जम्मू-कश्मीर की पहली महिला संतूर वादक हैं।
कश्मीर में लंबे समय से सूफी गायन में बजता रहा संतूर
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‘अमर उजाला’ से शनिवार को बातचीत में भजन सोपोरी ने कहा कि संतूर लम्बे समय से कश्मीर में सूफी गायन में बजता रहा है। इसका प्राचीन नाम शततंत्री वीणा रहा है। आज भी कश्मीर में ऐसे चार-पांच सूफी दल हैं।
सोपोरी ने बताया कि मेरे दादा शंकर पंडित जी संतूर के संस्कृत में बन्दिशें गाया करते थे। मेरे पिता शंभूनाथ सोपोरी भी संतूर कलाकार थे। पिता के ही मार्गदर्शन में मैंने संतूर सीखा। बोले, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में इसे लोकप्रिय करने का श्रेय मुझे ही मिलना चाहिए। पं. शिवकुमार शर्मा तबला बजाते थे और उन्हें भी मेरे पिता ने ही संतूर दिया था।
सोपोरी ने कहा कि संतूर को हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अनुकूल करने के लिए मैंने संतूर में कई बदलाव किए हैं। 25 गोटे (ब्रिज) के संतूर को मेरे पिता ने 27 ब्रिज का किया और मैंने इसे 44 ब्रिज का कर दिया है। इसलिए मेरा संतूर दूसरे संतूर वादकों के बड़ा है।
ब्रिज बढ़ाने से अब मेरे संतूर पर तीन सप्तक के स्वर बजाए जा सकते हैं जबकि दबाव तकनीकी से मैं इसे ढाई सप्तक का और विस्तार देता हूं। मेरे संतूर पर साढ़े पांच सप्तक तक स्वर बजाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि संतूर पर गायन का कुछ भी बजा पाना संभव है।
सोपोरी के साथ गाने लगे विद्यार्थी
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भजन सोपोरी के शनिवार को रामस्वरूप मेमोरियल पब्लिक स्कूल और राजकुमार अकादमी के कार्यक्रम में विद्यार्थी भी उनके साथ गाने लगे।
इन विद्यालयों में उन्होंने ‘बसंत मुखारी’ और ‘पटदीप’ राग बजाए और आलाप के बाद छंद आधारित जोड़ का वादन किया जिसके बाद उन्होंने गतें बजाईं। संतूर पर उनका साथ वीथिका टिक्कू ने तथा तबले पर मिथिलेश झा ने दिया।
अपने वाद्य को अपनाने की ललक थी : वीथिका
लड़कियां प्राय: सितार चुनती हैं या नृत्य करती हैं लेकिन वीथिका टिक्कू ने सन्तूर के रूप में ऐसे वाद्य को चुना है जिसमें लड़कियां गिनती की हैं। जम्मू-कश्मीर की वीथिका ने कहा कि मैं चाहती थी कि मैं अपने प्रदेश के वाद्य को सीखूं। वीथिका 11 वर्षों से इस वाद्य को बजा रही हैं। उन्होंने संगीत निर्देशन भी किए हैं।