संसद या राज्य विधानमंडलों में किसी सदस्य के वेल में आते ही उसका स्वत: निष्कासन हो जाने का नियम बनाने के लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के सुझाव से कई विधानसभा अध्यक्ष सहमत हैं।
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उनका कहना है कि वेल में आकर सदन को बाधित करने की बढ़ती परंपरा पर रोक लगाने और सदन का समय बचाने के लिए कोई न कोई रास्ता निकलना ही चाहिए। वे इस मुद्दे पर सम्मेलन में चर्चा कराकर कोई फैसला करने के पक्ष में हैं।
सुमित्रा महाजन ने पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था- उन्हें एक वकील ने सुझाव दिया है कि क्यों न ऐसी व्यवस्था लागू की जाए कि जो सदस्य वेल में आ जाए वह स्वत: ही सदन से निष्कासित हो जाए। इस पर पीठासीन अधिकारी को कोई व्यवस्था न देनी पड़े। इस पर विचार होना चाहिए कि क्या ऐसा हो सकता है?
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शनिवार को पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन के पहले दिन इस पर चर्चा तो नहीं हुई लेकिन कई विधानसभा अध्यक्ष इस सुझाव से सहमत दिखे। वे मानते हैं कि कभी एक सदस्य ही सदन की व्यवस्था बिगाड़ देता है। सदन का समय नष्ट होने से बचाने के लिए इस संबंध में ठोस फैसला होना चाहिए।
निष्कासन से ही रुकेगी वेल में एंट्री
तेलंगाना विधान परिषद के सभापति के स्वामी गौड कहते हैं कि लोकसभा अध्यक्ष का सुझाव अच्छा है। जब तक निष्कासन की व्यवस्था नहीं होगी, सदस्य वेल में आकर हंगामा करते रहेंगे, सदन का समय बर्बाद होता रहेगा। सदस्य पब्लिसिटी के लिए वेल में जाते हैं। वे प्रश्न प्रहर को बाधित करते हैं।
ऐसा करके विपक्षी सदस्य भले ही पब्लिसिटी पा जाते हों लेकिन वे सरकार का ही मदद करते हैं। जो समय जनता के मुद्दों पर मंत्रियों से जवाब मांगने का है, वह हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। यदि उनके स्वत: निष्कासन की व्यवस्था हो जाए तो सदस्य वेल में आएंगे ही नहीं।
सत्तापक्ष और विपक्ष निकाले रास्ता: अटवाल पंजाब विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. चरणजीत सिंह अटवाल का कहना है कि श्रीनगर कॉन्फ्रेंस में यह मुद्दा उठा था कि सदस्य वेल में आएं तो वे खुद ही निष्कासित माने जाएं। यह मुद्दा बड़ा गंभीर है। इस पर विचार होना चाहिए। एक-दो सदस्य ही कभी-कभी पूरे सदन को बाधित कर देते हैं।
कहीं न कहीं इस पर अंकुश लगाना पड़ेगा। हाउस की प्रक्रिया सुचारू चले यह सुनिश्चित होना चाहिए। स्वत: निष्कासित की व्यवस्था कुछ ज्यादा सख्त लग सकती है लेकिन सत्ता पक्ष, विपक्ष और दूसरे दलों को बैठकर इसका समाधान खोजना चाहिए। सबसे बड़ी चीज आत्मानुशासन है। यदि पार्टियां तय कर लें कि वे अपने सदस्यों के वेल में जाने पर रोक लगाएंगी तो सदन बाधित नहीं होगा।
की गई कानून बनाने की मांग
उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कहा, लोकसभा अध्यक्ष ने विचार करने का सुझाव दिया है कि वेल में सदस्य के आने पर क्यों न वह स्वत: निष्कासित माना जाए। इस पर शनिवार को चर्चा नहीं हुई लेकिन हम चाहते हैं कि चर्चा करके प्रस्ताव पारित किया जाए और कानून भी बने।
वह कहते हैं कि इस व्यवस्था को अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता बल्कि अलोकतांत्रिक आचरण तो वेल में आने वाले सदस्य करते हैं। उत्तेजित होकर वे पीठ की तरफ कुछ भी फेंक देते हैं। सत्ता पक्ष और विपक्षी उलझ जाते हैं।
राज्य विभाजन से पहले यूपी विधानसभा में सत्तापक्ष और विपक्षी सदस्यों के बीच जमकर हुई मारपीट के वह गवाह हैं। यदि वेल में सदस्यों के आने पर रोक लग जाए जो ऐसे काले दिनों से बचा जा सकता है।
छत्तीसगढ़ में तो पहले से है व्यवस्था: वर्मा छत्तीसगढ़ विधानसभा में सदस्यों के वेल में आने पर स्वत: निष्कासन की व्यवस्था है। फर्क इतना है कि निष्कासन की अवधि विधानसभा अध्यक्ष के विवेक पर निर्भर रहती है। छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव देवेन्द्र वर्मा ने टेलीफोन पर बताया कि इस व्यवस्था के बाद वेल में आकर हंगामे की घटनाओं में कमी आई है।
एक बार कुछ सदस्य वेल में आ गए तो अध्यक्ष ने कहा, जब नियम का पालन नहीं हो रहा तो क्यों न इसे रूल्स कमेटी को रेफर कर दिया जाए। इस पर विपक्षी दलों ने इसका पालन करने का आश्वासन दिया।
मध्य प्रदेश विधानसभा के सेवानिवृत्त प्रमुख सचिव आनंद कुमार प्यासी वेल में आने पर स्वत: निष्कासन की व्यवस्था को लोकतांत्रिक नहीं मानते। वह कहते हैं, ऐसे मुद्दों पर बहस तो ठीक है लेकिन व्यावहारिक पक्ष का भी ध्यान रखना चाहिए। कई बार गंभीर मुद्दे पर सदस्य उत्तेजनावश वेल में आ जाते हैं।
दो मंत्रियों ने बताया अलोकतांत्रिक उप्र सरकार के दो मंत्रियों ने वेल में सदस्य के आने पर उसके स्वत: निष्कासन के सुझाव को अलोकतांत्रिक और अव्यावहारिक कहा। उन्होंने अपनी भावना से लोकसभा अध्यक्ष को भी अवगत कराया।
मत्स्य एवं सार्वजनिक उद्यम मंत्री इकबाल महमूद और श्रम मंत्री शाहिद मंजूर ने उद्घाटन सत्र के बाद लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर उनके संबोधन की प्रशंसा की और कहा, निजी तौर उन्हें उनके सुझाव पर असहमति है। वेल में आने वाले सदस्य के स्वत: निष्कासित हो जाने की व्यवस्था प्रजातंत्र में उचित नहीं है।
इस पर लोकसभा अध्यक्ष ने कहा, यह उनका प्रस्ताव नहीं है। किसी ने सुझाव दिया था जो उन्होंने सम्मेलन में रखा है। इकबाल ने कहा, सदन का समय खराब नहीं होना चाहिए लेकिन निष्कासन की व्यवस्था होने पर विपक्ष कहेगा कि उसका गला दबाया जा रहा है। वेल में सदस्यों के जाने की परिस्थिति को भी देखना चाहिए। मंजूर ने कहा, निर्वाचित प्रतिनिधि पीठासीन अधिकारियों से लोकतंत्र को बचाने और सुदृढ़ करने की अपेक्षा रखते हैं।
यह प्रस्ताव नहीं केवल सुझाव : अंबिका प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं विकलांगजन विकास मंत्री अंबिका चौधरी ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ने केवल सुझाव दिया है। सम्मेलन में इस आशय का प्रस्ताव आए बिना उस पर टिप्पणी करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा, लोकसभा अध्यक्ष ने इंदौर के एक वकील के वक्तव्य का उल्लेख करते हुए यह मामला रखा था।