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यूपी का रण : चौपालों पर चर्चा है आम, चुनावी समरभूमि में स्थानीय मुद्दों का चक्रव्यूह

Sat, 08 Jan 2022 04:45 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, पंकज प्रसून

सार

चुनावी राहों में आतिश है, तो धुआं भी। सियासी गलियों की रंगत बदली-बदली सी है। ये रणनीति...वो रणनीति...। ये समीकरण...वो समीकरण...। ये सवाल...वो जवाब...। इन सबसे धड़कनें बढ़ी हुई हैं। बेचैनी बढ़ी हुई है। नींदें उड़ी हुई हैं। अरे! ये मौसम जो इम्तिहान का है। इस इम्तिहान का प्रश्नपत्र जनता तैयार कर रही है। ऐसा प्रश्नपत्र, जिसमें सवाल बहुत हैं। कई उलझे हुए। कई तीखेे। ...तो कुछ राहत देने वाले भी। कानपुर नगर, कानपुर देहात, हमीरपुर और जालौन में कैसे-कैसे सवाल हैं, क्या-क्या समीकरण बन रहे हैं, बता रहे हैं पंकज प्रसून...
 
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कानपुर के चेतना चौराहे पर चुनावी चर्चा.... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सबसे पहले बातें चुनावी समरभूमि की। कानपुर नगर, कानपुर देहात, जालौन और हमीरपुर में विधानसभा की कुल 19 सीटें हैं। 2017 में इनमें से 16 सीटों पर भगवा परचम फहराया था। कानपुर नगर की आर्यनगर और सीसामऊ सीट पर सपा की साइकिल ने कमाल दिखाया था, तो कैंट सीट कांग्रेस के खाते में गई थी। पर, आमजन से बातचीत में जो समीकरण सामने आते हैं, उससे साफ हो जाता है कि इस बार लहर जैसी कोई बात नहीं है। भाजपा को ज्यादातर जगहों पर सपा से टक्कर मिल रही है। तो कुछ जगहों पर बसपा और कांग्रेस मुकाबले को त्रिकोणीय बना रही हैं।

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गोविंदनगर, कल्याणपुर : चौपालों में यही चर्चा...  इस बार जीतेगा कौन?
कानपुर महानगर जनपद के शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में बतकही के कई अड्डे हैं। हम गोविंदनगर विधानसभा क्षेत्र के शास्त्रीनगर काली मठिया पहुंचे तोे दुकान पर चाय की चुस्कियों संग गरमा-गरम सियासी चर्चाएं चल रही थीं। जैसे ही सवाल उछला कि इस बार कौन... मनोज अवस्थी चाय का कुल्हड़ टेबल पर रखते हुए बोल पड़े-वैसे तो इस क्षेत्र का सबसे बड़ा मुद्दा तो एशिया की सबसे बड़ी श्रमिक कॉलोनियों के मालिकाना हक का है। मगर, नाराजगी के बावजूद योगी की चर्चा खूब है। बात सुनते ही दिनेश कुरील बोल पड़े- सबसे बढ़िया राज तो मायावती का था। पर, अब तो सारे समीकरण बदले हुए दिख रहे हैं। सोहन सिंह नई दलीलों के साथ मैदान में कूद पड़े। वे बोले, देखो भइया अभी तो भाजपा का माहौल दिख रहा है। पर, एक-दो ब्राह्मण प्रत्याशी दूसरी तरफ से मैदान में आ गए तो भाजपा के लिए मुश्किल भी हो सकती है। कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र का चुनावी मिजाज जानने के लिए हम आवास विकास पहुंचे। यहां शन्नेश्वर मंदिर वाली रोड का मुद्दा छिड़ा हुआ था। मो. हारून सरकारों को कोस रहे थे। कह रह रहे थे, सबसे ज्यादा चलने वाली सड़क पर सबसे ज्यादा गड्ढे भाजपा और सपा  के राज में हुए। पास खड़े शिवेंद्र सिंह भी चर्चा में कूद पड़े। उन्होंने कहा, जब मेट्रो चल गई तो सड़क बनने में कितनी देर लगेगी। वहां से थोड़ा आगे निकले तो लोग यही चर्चा कर रहे थे कि टक्कर तो भाजपा और सपा के बीच ही होगी। यहां मजदूरी के लिए खड़े लोग चुनावी चर्चा के बीच कह रहे थे कि अगर कोरोना बढ़ा तो वे बिना काम के हो जाएंगे।

आर्यनगर, सीसामऊ : कहीं चेहरे की तलाश पर चर्चा, तो कहीं लोग गा रहे परेशानियों का राग
आर्यनगर विधानसभा क्षेत्र में हम पहुंचे तो यहां भी ज्यादातर लोगों की बातों में सपा-भाजपा में टक्कर की चर्चा थी। हालांकि, इससे भी ज्यादा गरमा-गरम बहस हो रही थी संभावित प्रत्याशियों को लेकर। सवाल उछला-आर्यनगर से भाजपा का चेहरा कौन होगा? किशोर बाजपेई बोले- मोदी। पास खड़े जगदेव प्रसाद ने हंसते हुए जवाबी हमला बोला-पिछली बार भी मोदी ही चेहरा थे, लेकिन क्या हुआ, सबको पता है। अपनी दुकान का शटर उठाते हुए बब्बू भाई बोले- जो व्यापारियों की सुनेगा, वही यहां पर राज करेगा। चेतना चौराहे पर पहुंचे तो वहां एक चाय की दुकान पर नए-पुराने नेताओं के साथ भाजपा और सपा के वोट प्रतिशत को लेकर बहस चल रही थी। सीसामऊ विधानसभा क्षेत्र के चमनगंज से आगे हम बढ़े ही थे कि सफाई, ट्रैफिक समस्या को लेकर लोग तीखी बातचीत में उलझे दिखे। पान की दुकान पर खड़े शिवनाथ कह रहे थे, इहां सब सुधर जाएगा, लेकिन ई गंदगी नहीं जाएगी। जरा सी सड़क पर इधर-उधर हुए कि पीछे से कोई न कोई ठोक देता है। पास में खड़े खलील बोले- दिन भर कई-कई बार जाम में फंसकर ठंडी में भी पसीना निकल जाता है। यह सीट 2017 में सपा ने जीती थी। बहरहाल, लोगों की चर्चाओं में जो कुछ सामने आता है उसका लब्बोलुआब यही है कि यहां भी सपा-भाजपा में ही मुकाबला होने के आसार हैं।
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किदवईनगर, कैंट, महाराजपुर, बिठूर, घाटमपुर, बिल्हौर: भाजपा-सपा का ही ज्यादा शोर
ब्राह्मण बहुल सीट किदवईनगर में चाहे कांग्रेस हो या सत्ताधारी पार्टी, टिकट के लिए हर जगह खींचतान मची हुई है। वहीं, कैंट विधानसभा में दावेदारों की भीड़ दोगुनी हो चुकी है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर भाजपा से भी कई दावेदार मैदान में हैं। महाराजपुर हो, बिठूर हो, घाटमपुर हो या बिल्हौर विधानसभा क्षेत्र, हर जगह लोगों की बातचीत में फिलहाल भाजपा-सपा ही नाम सबसे ज्यादा सुनाई दिया।

अकबरपुर-रनिया, सिंकदरा, भोगनीपुर, रसूलाबाद: कड़े मुकाबले की बन रही पृष्ठभूमि
कानपुर देहात की रनिया विधानसभा क्षेत्र में हमें किसान कमलेश मिले। वे कहते हैं, सड़कें चौड़ी हुई हैं। आवागमन ठीक हुआ है, लेकिन जलनिकासी की दिक्कत खत्म नहीं हुई है। बारिश में हाल बेहाल हो जाता है। यहां के रायपुर गांव के सुधीर का कहना है कि शहर की तरह खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए यहां भी खेल के मैदान दुरुस्त किए जाने चाहिए। वे भाजपा और सपा में सीधा मुकाबला मानते हैं। सिकंदरा विधानसभा क्षेत्र के मुकेश बताते हैं कि अभी तक अमराहट पंप कैनाल का दूसरा चरण अधूरा है। इसकी वजह से बीहड़ पट्टी में सिंचाई की समस्या है। इसे लेकर किसान आवाज बुलंद करते रहे हैं। वहीं, केराजपुर गांव के मुबीन कहते हैं कि यमुना नदी पर चल रहा पुल निर्माण का काम काफी धीमा है।  मुबीन व मुकेश का मानना है कि यहां भाजपा को सपा से कड़ी टक्कर मिलेगी। भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र के राजीव बताते हैं कि अभी क्षेत्र में गांवों को जोड़ने वाली सड़कें बदहाल हैं। मुख्य सड़क तक जाने में काफी दिक्कत होती है। लोगों में इसको लेकर नाराजगी है। रसूलाबाद विस क्षेत्र की अनीता कहती हैं, कई सड़कों का निर्माण जरूर हुआ, लेकिन छुइया नाला व नहरों के ध्वस्त पुल जल्द बनाए जाने की जरूरत है। कहिंजरी के आनंद बताते हैं कि इस क्षेत्र में हवाई पट्टी तो बन गई, लेकिन जल निकासी की व्यवस्था नहीं होने से लोग परेशान रहते हैं। हालांकि, चुनाव में माहौल कैसा है,इस सवाल पर वे कहते हैं कि सपा कड़ी टक्कर देते दिख रही है।

जालौन, कालपी, माधौगढ़, उरई: भाजपा-सपा-बसपा में दिख रहा मुकाबला
सदर सीट आरक्षित और कोरी बहुल है। मुहम्मदाबाद क्षेत्र के एक टेंट हाउस की दुकान पर अलाव तापते मिले रिसालत बाबा कहते हैं कि भाजपा सरकार में काम तो हुए हैं, लेकिन मवेशियों के चलते फसल को हो रहे नुकसान से किसान परेशान हैं। पास में बैठे आकाश यादव ने कहा कि सरकार रोजगार के वादे को पूरा नहीं कर पाई। रोजगार देने वाली सरकार को ही हम चुनेंगे।  ठाकुर व पिछड़े मतदाताओं की बहुलता वाली सीट कालपी में बसपा-भाजपा में सीधी टक्कर मानी जा रही है। माधौगढ़ सीट एससी और ठाकुर मतदाता बहुल है। यहां भाजपा व सपा में टक्कर मानी जा रही है। उरई सीट पर भाजपा का कब्जा है। यहां भी भाजपा को सपा और बसपा से चुनौती मिलती दिख रही है।

हमीरपुर, हमीरपुर सदर और राठ: किसानों और स्वास्थ्य के सवाल दिखाएंगे रंग
हमीरपुर सदर व राठ सीट पर फिलहाल  भाजपा व सपा के बीच मुख्य मुकाबला नजर आ रहा है। लोग कहते हैं कि अन्ना गोवंश से कुछ राहत तो मिली है। शहर से महज 8 किमी. दूर कारीमाटी गांव के रहने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक रामसजीवन सिंह कहते हैं, रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है। वहीं, रामगोपाल सिंह कहते हैं कि बाढ़ से प्रभावित होने के बाद भी क्षतिपूर्ति नहीं मिली है। बबलू सिंह को लगता है कि शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र के मुख्य मुद्दे हैं, जिन पर सरकार ने कोई खास काम नहीं किया है। सुमेरपुर कस्बे के नेहा चौराहा के पास अलाव तापते मिले भोला सिंह कहते हैं कि सरकार की जनहित की योजनाओं का लाभ पार्टी को मिलेगा। फैक्टरी एरिया में काम करने वाले मेरठ निवासी प्रमोद कुमार ने कहा कि कृषि बिलों पर किसानों का आंदोलन भारी रहा। रोजगार को लेकर भी लोगों में बहुत सवाल हैं। इन सब पैमानों पर लोग सबको परख रहे हैं। नदेहरा निवासी ऑटो चालक भूरा साहू कहते हैं कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों को लेकर लोगों में नाराजगी है। खासकर उनके काम-काज को लेकर लोगों में काफी सवाल हैं। पर, दूसरी तरफ कस्बा निवासी डॉ. नरेश शर्मा का कहना है कि सरकार ने कोरोना की लड़ाई बहुत अच्छे से लड़ी। महामारी से बचाव के लिए लोगों को मुफ्त में टीका लगवा रही है। योजनाओं का फायदा सबको मिल रहा है। लोगों की चर्चाओं में यह भी आता है कि जिले की दोनों विधानसभा सीट पर भाजपा को सपा, बसपा से कड़ी चुनौती मिल रही है।

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चुनावी चकल्लस : मैं ही हूं... दूसरा कोई नहीं

चुनावी मौसम है। बेचारे नेताओं के लिए तो यही सावन है, यही भादो है। अंबर में सपनों का स्वयंवर रचा हुआ है। दिल में रह-रहकर हूक उठती है, काश! टिकट मिल जाए तो ये चुनावी सावन मनभावन हो जाए। यह सावन गया तो फिर...? पांच साल...! यह सोच-सोचकर ही नादान दिल बैठ जाता है। बस किसी तरह रंग जम जाए, इसलिए पार्टी दफ्तर में सब टेर लगा रहे हैं। गीत गा रहे हैं-मैं ही मैं हूं...दूसरा कोई नहीं। हर अंतरे में ऐसे जतन कर रहे हैं कि प्रतिद्वंद्वी की खटिया खड़ी और बिस्तर गोल हो जाए। बड़के नेता हैं कि ई सब सुन-सुनकर परेशान हो गए। कान ही पक गए। पता नहीं कौन मंतर दिया और गाना बंद करा दिया गया। सब कुछ लिखत-पढ़त में बायोडाटा में देने की व्यवस्था हो गई। पर, दावेदार कहां मानने वाले। उसमें भी लंबी-लंबी फेंक रहे हैं- मैं ही मैं हूं...।

अपनी काबिलियत से ज्यादा दूसरे की खटिया खड़ी करने पर जोर
  • मौजूदा विधायक जी से जनता बहुत नाराज है। यदि विधायक जी को टिकट दिया गया तो चाहे किसी नेता की सभा करा लीजिए पार्टी चुनाव नहीं जीत पाएगी।
  • मुझसे ज्यादा जिताऊ और टिकाऊ दावेदार कोई नहीं है। पार्टी चाहे तो क्षेत्र में सर्वे करा ले। यदि 100 में से 80 लोग मेरा नाम नहीं लें तो कहना, मैं राजनीति छोड़ दूंगा।
  • मैंने अभाविप से राजनीति की शुरुआत की। संघ की शाखा में भी गया। क्षेत्र में पार्टी को मजबूत बनाने में हमारे जितना योगदान किसी दूसरे का नहीं है।
  • प्रतिद्वंद्वी दावेदार ने हमेशा पार्टी का विरोध किया है। सरकार के खिलाफ बयानबाजी की है। यही नहीं, उसका माफिया से संबंध है।
  • जन विश्वास यात्रा में पांच हजार समर्थकों के साथ स्वागत किया। मोदी-योगी जी की सभा में सौ बसों में कार्यकर्ता को लेकर पहुंचा था।
  • एक बार मौका दे दीजिए, चुनाव हार गया तो फिर मुंह नहीं दिखाऊंगा।
  • प्रतिद्वंद्वी दावेदार के खिलाफ थानों में आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।
  • संघ में बात हो गई है, भाई साहब का पूरा आशीर्वाद है। जिले और पूरी क्षेत्रीय टीम मेरे साथ है। बस आप पैरवी कर देंगे तो टिकट पक्का हो जाएगा।   
रफी साहब ने सिखाया अंग्रेज अफसर को सबक
बाराबंकी के मसौली के रहने वाले रफी अहमद किदवई किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तो थे ही कांग्रेस के बड़े नेता भी थे। रफी साहब बेहद ईमानदार एवं सरल राजनेता थे। वह 1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत गठित सरकार में मंत्री थे। डॉ. एम. हाशिम किदवई के संस्मरण से पता चलता है कि भारतीयों ने सरकार तो बना ली, लेकिन अंग्रेज अफसर उसको बहुत तवज्जो नहीं देना चाहते थे। मंत्रियों का सम्मान करने में भी उन्हें अपमान महसूस होता था। एक बार रफी साहब गोरखपुर गए। वहां के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जो एक अंग्रेज था, वह शिष्टाचार के तहत रेलवे स्टेशन नहीं आया। उसे शायद पुराने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का स्वागत करना अपनी शान के खिलाफ  लगा होगा। रफी साहब वहां तो कुछ नहीं बोले, क्योंकि उस समय के कानून के मुताबिक वह उस अफसर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तो कर नहीं सकते थे। पर, लखनऊ लौटते ही उसका तबादला सचिवालय में अपने विभाग में करा दिया। अब उसे वह दिन में कई-कई बार बुलाते और अपने सामने खड़ा रखते। जब वह बहुत परेशान हो गया तो एक बड़े अफसर से रफी साहब से सिफारिश कराई। सिफारिश करने वाले अफसर से उन्होंने कहा, जनाब को बता दो, हम छेड़ते नहीं लेकिन छोड़ते भी नहीं।
-अखिलेश वाजपेयी
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