जीत के बाद जश्न मनाते सपा कार्यकर्ता
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बसपा ने हालांकि दोनों उपचुनावों में किसी भी दल को अपना खुला समर्थन नहीं दिया, लेकिन दलितों में संदेश साफ था। आम तौर पर उनका रुझान भाजपा के खिलाफ और गठबंधन के पक्ष में रहा। माना जा रहा है कि बसपा वेस्ट यूपी में जाट और मुसलमानों के बीच की केमिस्ट्री की थाह लेना चाहती थी।
परखना चाहती थी कि 2013 के दंगों के बाद उनके बीच पैदा हुई खाई कितनी पटी है? इसके बाद ही वह रालोद को लेकर अपनी राय बनाना चाहती थी। जाट बहुल गांवों में तबस्सुम के पक्ष में पड़े वोटों ने साबित कर दिया कि दंगों के बाद यमुना में बहुत पानी बह चुका है।
जाट, मुसलमानों और दलितों ने न केवल गठबंधन (रालोद) को वोट किया, वरन वे साथ खड़े भी नजर आए। इससे भाजपा विरोधी गठबंधन को मजबूती मिलेगी और उसमें रालोद की स्वीकार्यता बढ़ेगी।
भाजपा गोरखपुर व फूलपुर की हार से सबक लेकर कैराना व नूरपुर उपचुनाव में मैदान में उतरी थी। ये दोनों सीटें भाजपा के सांसद व विधायक के निधन से खाली हुई थीं। भाजपा ने 2014 व 2017 के फॉर्मूले से फिर इन्हें जीतने की कोशिश की। चुनाव प्रबंधन बेहतर किया, लेकिन उसकी रणनीति सफल नहीं हो सकी।
भाजपा नेताओं ने दंगे की याद दिलाई, कैराना से पलायन के मुद्दे को उठाया। यहां तक कहा कि कैराना में भाजपा की हार का जश्न पाकिस्तान में मनेगा। चुनाव के बीच जिन्ना का मुद्दा भी उठा लेकिन जनता में इन्हें व्यापक समर्थन नहीं मिल सका। कैराना में रालोद व नूरपुर में सपा की जीत के बाद भाजपा को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।
कैराना सीट पर लगभग 32 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इससे सटी सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा, रामपुर जैसी सीटों पर मुस्लिम वोट इससे कहीं ज्यादा हैं। मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत समेत कुछ अन्य जिलों में मुसलमान आबादी 25 से 30 फीसदी तक है। इन जिलों में दलित अच्छी खासी तादाद में हैं। जाट भी कहीं कम कहीं ज्यादा, सभी जगह हैं। ऐसे में यदि 2019 में सपा, बसपा, रालोद व अन्य छोटे दलों का गठबंधन बना तो यह भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।