सपा में इन दिनों एक कहावत काफी चर्चा में है- ‘जबरा मारे रोवै न देय, कमजोर मारा जाए तो रोवै न पाए’। इसके चर्चा में आने के पीछे ताजा मामला पार्टी के राष्ट्रीय सचिव कमाल फारूखी का है।
बेचारे! सोचा था कि भले आतंकी ही सही, पर यासीन भटकल है तो मुसलमान। उसकी पैरोकारी करेंगे तो नेताजी खुश होंगे। इनाम मिलेगा।
आखिर खनन से लेकर परिक्रमा के मुद्दे पर आजम जैसे बड़े नेता भी तो मुसलमानों को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने से नहीं चूकते।
फिर सरकार खुद ही कह चुकी है कि तमाम मुसलमान युवक बेगुनाह हैं, जिन्हें आतंकी घटनाओं में आरोपी बनाकर मुजरिम बना दिया गया है। बेचारे को क्या मालूम था कि कार्रवाई हो जाएगी।
अब सपा कार्यालय में बाहर से लेकर भीतर तक चर्चा सिर्फ यही है कि कमाल मियां को कोई कमाल दिखाने से पहले अपनी और दूसरे की ताकत का गुणा-भाग तो कर ही लेना चाहिए था।