हवा में उड़ने वाले मंत्री के गले में इस समय जाटलैंड की फांस अटकी हुई है। वेस्ट यूपी की सिसायत में असर रखने वाले चौधरी साहब को नहीं सूझ रहा कि फांस निकले कैसे?
एक तरफ बेस वोट है तो दूसरी तरफ संभावित समीकरण। वेस्ट यूपी के दो जिलों में सांप्रदायिक तनाव पर पार्टी कोई स्टैंड नहीं ले पा रही है। इधर कुआं-उधर खाई वाली स्थिति है। बड़े नेताओं के होठ सिले हैं।
वे आक्रोशित भीड़ के बीच जाने से कतरा रहे हैं। उम्मीद थी, दो-चार दिन में स्थिति सुधर जाएगी, पर माहौल है कि सुधरने का नाम नहीं ले रहा। कई लोग कह रहे हैं कि इन हालात में पश्चिम में गिरते जल स्तर के बीच हैंडपंप से पानी की धार धीमी पड़ सकती है।
दूसरी परेशानी फूल वालों की सक्रियता ने बढ़ा दी है। उनकी तो मानो बिना कुछ किए मन की मुराद पूरी हो रही है। जहां भी बवाल की सूचना मिल रही है, तुरंत पहुंच रहे हैं।
बड़ी पंचायतों की महफिल तो उन्हीं के नाम हो रही है। सवाल उठ रहा है कि सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने वाले माहौल का सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा?