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पर्यावरण की चिंता न ही कोर्ट के आदेश का असर

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पर्यावरण की चिंता न ही कोर्ट के आदेश का असर
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अंबेडकरनगर। जिले में पॉलीथिन के प्रयोग को लेकर पूरी तरह मनमानी का माहौल है। अनुमान के अनुसार जिले में प्रतिमाह लगभग 40 क्विंटल पॉलीथिन का प्रयोग किया जाता है।


न्यायालय की रोक के बावजूद धड़ल्ले से प्रयोग की जा रही पॉलीथिन के चलते न सिर्फ पर्यावरण दूषित हो रहा है, बल्कि इससे गंदगी भी फैल रही है। नाले-नालियों में पॉलीथिन फेंकने से जिला मुख्यालय पर ही जगह-जगह नाले व नाली चोक हो गई हैं।
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समुचित जलनिकासी नहीं होने से गंदा पानी पटरियों व सड़क पर बहता रहता है। इससे एक तरफ जहां संक्रामक रोगों के फैलने की आशंका बनी हुई है, वहीं लोगों को आवागमन में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।


पर्यावरण दूषित होने से बचाने के लिए न्यायालय ने 50 माइक्रॉन से कम वाली पॉलीथिन के प्रयोग पर रोक लगा दी थी। न्यायालय के तमाम दिशा-निर्देश के बावजूद इसकी बिक्री व प्रयोग पर रोक लगाने को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई।


लंबे समय से इसे लेकर जिले में कोई अभियान भी नहीं चलाया गया। नतीजतन ऐसी पॉलीथिन का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है। इससे न सिर्फ पर्यावरण दूषित हो रहा है, बल्कि गंदगी भी फैल रही है।


पॉलीथिन का प्रयोग कितना अधिक किया जा रहा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रतिमाह जिला मुख्यालय पर लगभग 500 किलोग्राम पॉलीथिन का कूड़ा निकलता है। अनुमान है कि जिले में प्रतिमाह लगभग 40 क्विंटल पॉलीथिन का प्रयोग किया जाता है।


कूड़े में फेंकी जाने वाली पॉलीथिन से अक्सर नाले-नालियां चोक हो जाते हैं। इससे गंदा पानी पटरियों से होता हुआ सड़कों पर बहता है। जिससे जहां संक्रामक रोगों के फैलने की आशंका बनी रहती है, वहीं लोगों को आवागमन में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।


अब जबकि नगर को साफ-सुथरा रखने को लेकर प्रदेश सरकार ने आगामी 15 जुलाई से 50 माइक्रॉन से कम वाली पॉलीथिन की बिक्री व प्रयोग पर रोक लगा दी है। ऐसे में जिले में इन निर्देशों का कितना पालन हो सकेगा, ये आने वाला समय ही बताएगा।


जिले में बीते एक वर्ष में कूड़े कचरे के चलते सात मवेशियों की मौत हो चुकी है। दरअसल छुट्टा जानवर कूड़े के ढेर से खाद्य सामग्री तलाशते हैं। ऐसे में खाद्य सामग्री के साथ ही पॉलीथिन भी उनके पेट में चली जाती है। इससे उन्हें विभिन्न प्रकार का रोग हो जाता है, जिसका इलाज नहीं होने पर इन जानवरों की मौत हो जाती है।


कूड़े में पॉलीथिन नहीं डालने के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए लंबे समय से कोई अभियान जिले में नहीं चल सका है। पशु चिकित्सा विभाग के मुताबिक टांडा, जलालपुर, बसखारी, भीटी, इल्तिफातगंज आदि क्षेत्रों में सात मवेशियों की मौत बीते एक वर्ष में हो चुकी है।


अकबरपुर नगर पालिका परिषद के अधिशाषी अधिकारी सुरेश कुमार मौर्य का कहना है कि, पर्यावरण दूषित होने से बचाने व नगर को स्वच्छ रखने के लिए लोगों को खुद भी जागरूक होना होगा।
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पॉलीथिन के प्रयोग की बजाए जूट व खादी के झोले का प्रयोग करना चाहिए। शासन के निर्देशानुसार 50 माइक्रॉन से कम वाली पॉलीथिन की बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र ही टीम का गठन कर अभियान चलाया जाएगा।
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