निर्जला एकादशी का शुभ मुहूर्त
- निर्जला एकादशी पर पूजा का शुभ मुहूर्त- सुबह 5 बजकर 23 मिनट से 6 बजकर 34 मिनट तक
- व्यतिपात योग- सुबह 10 बजकर 13 मिनट तक
- चित्रा नक्षत्र - 6 जून को पूरे दिन बना रहेगा।
- अभिजीत मुहूर्त-11:55-12:43
- अमृतकाल- पूरे दिन बना रहेगा।
निर्जला एकादशी पूजा विधि
- निर्जला एकादशी के दिन सुबह ही स्नान कर लें।
- आप इस दिन साफ वस्त्रों को धारण करें और यदि संभव हो, तो पीले रंग के कपड़े पहनें।
- अब एक चौकी पर भगवान विष्णु की मूर्ति रखें।
- भगवान को वस्त्र अर्पित करें।
- फूल, मिठाई, फल चढ़ाएं।
- अब शुद्ध देसी घी से दीप जला लें।
- इसके बाद भगवान विष्णु का स्मरण करें।
- मंत्रों का जप करें और निर्जला एकादशी व्रत कथा पढ़ें।
- अंत में प्रभु की आरती करें।
- ध्यान रखें कि यह निर्जला एकादशी है, इसलिए पूरे दिन पानी ग्रहण न करें।
निर्जला एकादशी पर करें इन चीजों का दान
- निर्जला एकादशी के दिन जल का विशेष महत्व होता है। इस दिन मिट्टी या तांबे के पात्र में जल भरकर दान देना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इसे जीवनदाता और पापनाशक कहा गया है। जलदान से प्यासे प्राणियों की सेवा होती है और व्यक्ति के जीवन में शांति और सुख की वृद्धि होती है।
- इस दिन किसी ब्राह्मण, साधु या गरीब को फल या मिठाई का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में इसे अन्नदान की तरह महत्वपूर्ण माना गया है। यह व्यक्ति के जीवन में मधुरता और सौभाग्य लाता है।
- निर्जला एकादशी के दिन फलों का दान करना चाहिए। यह बहुत शुभ होता है।
- निर्जला एकादशी पर आप अनाज का दान कर सकते हैं। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।
- निर्जला एकादशी पर आप क्षमतानुसार वस्त्रों का दान कर सकते हैं।
- आप पंखा, खरबूजा, गुड़, बिस्तर और छाता दान कर सकते हैं।
निर्जला एकादशी पर घर लाएं ये तीन शुभ चीजें
- सनातन धर्म में गाय को माता और कामधेनू का दर्जा दिया गया है, जो सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाली मानी जाती है। निर्जला एकादशी के दिन घर में कामधेनू गाय की मूर्ति या चित्र लाना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।
- तुलसी को हिंदू धर्म में पवित्र माना गया है और इसे माता लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। निर्जला एकादशी के दिन तुलसी का पौधा घर लाएं और इसे घर के पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा में लगाएं। इस दिन तुलसी की पूजा करें और साथ ही घी के दीपक जलाएं।
- मोर पंख को सनातन धर्म में शुभ और श्रीकृष्ण का प्रतीक माना जाता है। निर्जला एकादशी के दिन मोर पंख घर लाकर इसे मंदिर में रखें। यह वास्तु दोष को दूर करता है और घर में सौहार्द बनाए रखता है।
निर्जला एकादशी पर करें तुलसी से जुड़े उपाय
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए निर्जला एकादशी पर कुछ विशेष उपाय किए जा सकते हैं। इस दिन मां लक्ष्मी को श्रद्धा से श्रीफल अर्पित करें, फिर तुलसी के पौधे की विधिपूर्वक पूजा करें। ऐसा करने से भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।
- इस दिन एक और महत्वपूर्ण उपाय यह है कि तुलसी की मंजरी (फूल) को भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित करें। मान्यता है कि इस साधारण-से दिखने वाले कार्य से भी भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं, और जीवन में सुख-समृद्धि का प्रवाह शुरू होता है। इससे पुराने कष्ट और बाधाएं भी दूर होने लगती हैं।
- शाम के समय, तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाएं और उसकी ग्यारह बार परिक्रमा करें। यह उपाय जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने में सहायक होता है। इन सरल लेकिन प्रभावशाली उपायों को श्रद्धा और आस्था से करने पर विष्णु-लक्ष्मी की कृपा सहज ही प्राप्त हो सकती है।
निर्जला एकादशी पर राशि के अनुसार करें इन मंत्रों का जाप
- मेष राशि के लोग 'ऊँ श्री प्रभवे नम: और ॐ महाकन्यायै नमः' मंत्र का जप करें।
- वृषभ राशि वाले 'ऊँ श्री सुरेशाय नम: और ॐ महादेव्यै नमः' मंत्र का जप कर सकते हैं। यह आपके लिए शुभ है।
- मिथुन राशि के लोग निर्जला एकादशी पर 'ऊँ श्री कमलनयनाय नम: और ॐ त्रिपुरायै नमः' मंत्र का जप कर सकते हैं।
- कर्क राशि वाले 'ऊँ श्री धनंजाय नम: मंत्र का जप करें। इससे सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
- सिंह राशि वाले 'ऊँ श्री कृष्णाय नम: और ॐ देव्यै नमः' मंत्र का जप करें।
- कन्या राशि के लोग ' ऊँ श्री विष्णवे नम: और ॐ परमायै नमः' मंत्र का जप कर सकते हैं।
- तुला राशि के जातक 'ऊँ श्री भूभवे नम: मंत्र का जप करें।
- वृश्चिक राशि के लोग 'ऊँ श्री प्रजापतये नम: और ॐ मोहिन्यै नमः'मंत्र का जप कर सकते हैं।
- धनु राशि के जातक 'ऊँ श्री उपेन्द्राय नम: और ॐ चन्द्रिकायै नमः' मंत्र का जप कर सकते हैं।
- मकर राशि के जातक 'ऊँ श्री शत्रुजिते नम: मंत्र का जप करें।
- कुंभ राशि के लोग 'ऊँ श्री माधवाय नम: मंत्र का जप करें।
- मीन राशि के लोग ॐ सिद्धलक्ष्म्यै नमः' मंत्र का जप करें।
Nirjala Ekadashi 2025
- फोटो : freepik
निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु को लगाएं इन चीजों का भोग
- पंचामृत का भोग निर्जला एकादशी पर भगवान विष्णु को अर्पित करना शुभ माना जाता है। पंचामृत दूध, दही, शहद, चीनी और घी के मिश्रण से तैयार किया जाता है। इस पवित्र मिश्रण का उपयोग भगवान विष्णु के अभिषेक और भोग के लिए किया जाता है। इसे अर्पित करने से सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- पंजीरी भी इस दिन भगवान विष्णु को अर्पित करने की विशेष परंपरा है। यह धनिया और सूखे मेवों से बनाई जाती है, जो सात्विक और स्वादिष्ट होती है। पंजीरी को भोग के रूप में चढ़ाने से धन-धान्य और समृद्धि में वृद्धि होती है। इसे तुलसी पत्र के साथ अर्पित करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।
- मखाने की खीर भी इस दिन भगवान विष्णु को अर्पित की जाती है। यह सात्विक और स्वादिष्ट भोग है, जो स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक है। मखाने की खीर दूध, चीनी और मेवों के साथ बनाई जाती है और तुलसी पत्र के साथ अर्पित की जाती है।
Nirjala Ekadashi 2025
- फोटो : अमर उजाला
निर्जला एकादशी पर इन तीन राशि वालों की चमकेगी किस्मत
- निर्जला एकादशी पर मिथुन राशि वालों को धन लाभ हो सकता है। आपको परिवार का साथ वह सहयोग प्राप्त होता है। इसके अलावा जिन कार्यों को पूरा करने में लगातार मेहनत कर रहे थे, वह पूरा होगा। आप निर्जला एकादशी पर विष्णु जी की पूजा करें और उन्हें पीले रंग के फूल अर्पित करें। इसके प्रभाव से नौकरी में तरक्की की प्राप्ति हो सकती है।
- कन्या राशि वालों के सभी तरह के भौतिक सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी होगी। बिजनेस में लाभ के अवसरों में बढ़ोतरी होगी। आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। नौकरी के नए अवसर मिल सकते हैं। नए मित्र बन सकते हैं। आप निर्जला एकादशी पर विष्णु जी को पीले वस्त्र अर्पित करें। इससे आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
- आपके सुख में वृद्धि होगी। धन लाभ के अवसरों में भी वृद्धि होगी। नौकरीपेशा लोगों को नई नौकरी के बेहतर अवसर मिल सकते हैं। लाभ के अवसर मिलेंगे। आप निर्जला एकादशी के दिन पंखों का दान करें। इससे प्रेम जीवन में रिश्ते मजबूत होंगे। आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
निर्जला एकादशी की कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक बार शौनक आदि ऋषियों ने ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी की कथा जानने की इच्छा व्यक्त की। तब सूतजी ने बताया कि एक बार भीमसेन ने महर्षि व्यास से कहा हे पितामह! मेरे परिवार के सभी सदस्य एकादशी को व्रत करते हैं, परंतु मैं बिना भोजन किए नहीं रह सकता। मेरा पेट अग्नि के समान है, जो अधिक भोजन से ही शांत होता है। कृपया कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं व्रत का पुण्य भी पा सकूं और भूखा भी न रहूं। महर्षि व्यास ने कहा -हे भीमसेन! यदि तुम पूरे वर्ष केवल एक व्रत करना चाहते हो, तो ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जल रहकर उपवास करो। इस दिन जल भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। केवल आचमन के लिए 6 माशे (लगभग 24 मिली) से अधिक जल न लें, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक बिना जल के व्रत करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है।
भीमसेन ने साहसपूर्वक इस व्रत को किया। व्रत के प्रभाव से वे अचेत हो गए। तब उन्हें गंगाजल, तुलसी चरणामृत और प्रसाद देकर होश में लाया गया। तभी से यह व्रत भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
Nirjala Ekadashi 2025
- फोटो : adobe
Nirjala Ekadashi 2025 Significance: निर्जला एकादशी व्रत का महत्व
एकादशी स्वयं विष्णुप्रिया है इसलिए इस दिन निर्जल व्रत, जप-तप, दान-पुण्य करने से प्राणी श्री हरि का सानिध्य प्राप्त कर जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। निर्जला एकादशी के इस महान व्रत को 'देवव्रत' भी कहा जाता है क्योंकि सभी देवता, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नवग्रह आदि अपनी रक्षा और जगत के पालनहार श्री हरि की कृपा प्राप्त करने के लिए एकादशी का व्रत करते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार एकादशी में ब्रह्महत्या सहित समस्त पापों का शमन करने की शक्ति होती है,इस दिन मन,कर्म,वचन द्वारा किसी भी प्रकार का पाप कर्म करने से बचने का प्रयास करना चाहिए,साथ ही तामसिक आहार के सेवन से भी दूर रहना चाहिए।
Vishnu Ji Ki Aarti: भगवान विष्णु की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥
Laxmi Ji Ki Aarti: मां लक्ष्मी की आरती
ऊं जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।।
तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
मैया तुम ही जग-माता।।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
मैया सुख संपत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
तुम पाताल-निवासिनि,तुम ही शुभदाता।
मैया तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी,भवनिधि की त्राता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
मैया सब सद्गुण आता।
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
मैया वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव,सब तुमसे आता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।
मैया क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
महालक्ष्मी जी की आरती,जो कोई नर गाता।
मैया जो कोई नर गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
ऊं जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता।
ऊं जय लक्ष्मी माता।।
Nirjala Ekadashi 2025 Wishes: पुण्य और परोपकार का प्रतीक है निर्जला एकादशी, अपने करीबियों को भेजें ये शुभकामना
निर्जला एकादशी
- फोटो : adobe
निर्जला एकादशी व्रत के नियम
- पारण के समय केवल सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
- प्याज-लहसुन जैसे तामसिक खाद्य पदार्थों का परहेज करें।
- पूजा के दौरान शुद्धता और नियमों का विशेष ध्यान रखें।
निर्जला एकादशी पर करें ये सरल उपाय
- निर्जला एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी पत्र अर्पित करें और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 बार जाप करें।
- इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु को श्रीफल (नारियल) अर्पित करें और फिर इसे किसी जरूरतमंद को दान करें।
- इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
- निर्जला एकादशी पर अन्न, जल, वस्त्र और छाता का दान करें। यह उपाय स्वास्थ्य समस्याओं को भी कम करता है।
श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र
विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १ ॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २ ॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४ ॥
स्वयम्भूः शम्भुरदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५ ॥
अप्रमेयो हृशीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७ ॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८ ॥
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञ कृतिरात्मवान् ॥ ९ ॥
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १० ॥
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११ ॥
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२ ॥
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वत स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ १३ ॥
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४ ॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५ ॥
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६ ॥
उपेन्द्रो वामनः प्रंशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ १७ ॥
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रयो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ १८ ॥
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९ ॥
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २० ॥
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥ २१ ॥
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा॥ २२ ॥
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधिः॥ २३ ॥
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥ २४ ॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सं-प्रमर्दनः।
अहः संवर्तको वह्निः अनिलो धरणीधरः।।25।।
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृक्-विश्वभुक्-विभुः।
सत्कर्ता सकृतः साधु: जह्नु:-नारायणो नरः।।26।।
असंख्येयो-अप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्ट-कृत्-शुचिः।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः।।27।।
वृषाही वृषभो विष्णु: वृषपर्वा वृषोदरः।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुति-सागरः।।28।।
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेंद्रो वसुदो वसुः।
|नैक-रूपो बृहद-रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः।।29।।
ओज: तेजो-द्युतिधरः प्रकाश-आत्मा प्रतापनः।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मंत्र: चंद्रांशु: भास्कर-द्युतिः।।30।।
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिंदुः सुरेश्वरः।
औषधं जगतः सेतुः सत्य-धर्म-पराक्रमः।।31।।
भूत-भव्य-भवत्-नाथः पवनः पावनो-अनलः।
कामहा कामकृत-कांतः कामः कामप्रदः प्रभुः।।32।।
युगादि-कृत युगावर्तो नैकमायो महाशनः।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजित्-अनंतजित।।33।।
इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखंडी नहुषो वृषः।
क्रोधहा क्रोधकृत कर्ता विश्वबाहु: महीधरः।।34।।
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः।
अपाम निधिरधिष्टानम् अप्रमत्तः प्रतिष्ठितः।।35।।
स्कन्दः स्कन्द-धरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः।
वासुदेवो बृहद भानु: आदिदेवः पुरंदरः।।36।।
अशोक: तारण: तारः शूरः शौरि: जनेश्वर:।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः।।37।।
पद्मनाभो-अरविंदाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत।
महर्धि-ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुड़ध्वजः।।38।।
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः।
सर्वलक्षण लक्षण्यो लक्ष्मीवान समितिंजयः।।39।।
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतु: दामोदरः सहः।
महीधरो महाभागो वेगवान-अमिताशनः।।40।।
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः।।41।।
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो-ध्रुवः।
परर्रद्वि परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः।।42।।
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठ: धर्मो धर्मविदुत्तमः।।43।।
वैकुंठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः।।44।।
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्व-दक्षिणः।।45।।
विस्तारः स्थावर: स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम।
अर्थो अनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः।।46।।
अनिर्विण्णः स्थविष्ठो-अभूर्धर्म-यूपो महा-मखः।
नक्षत्रनेमि: नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः।।47।।
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमं।।48।।
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत।
मनोहरो जित-क्रोधो वीरबाहुर्विदारणः।।49।।
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः।।50।।
धर्मगुब धर्मकृद धर्मी सदसत्क्षरं-अक्षरं।
अविज्ञाता सहस्त्रांशु: विधाता कृतलक्षणः।।51।।
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद गुरुः।।52।।
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
शरीर भूतभृद्भोक्ता कपींद्रो भूरिदक्षिणः।।53।।
सोमपो-अमृतपः सोमः पुरुजित पुरुसत्तमः।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः।।54।।
जीवो विनयिता-साक्षी मुकुंदो-अमितविक्रमः।
अम्भोनिधिरनंतात्मा महोदधिशयो-अंतकः।।55।।
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः।
आनंदो नंदनो नंदः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः।।56।।
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश्रृंगः कृतांतकृत।।57।।
महावराहो गोविंदः सुषेणः कनकांगदी।
गुह्यो गंभीरो गहनो गुप्तश्चक्र-गदाधरः।।58।।
वेधाः स्वांगोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणो-अच्युतः।
वरूणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः।।59।।
भगवान भगहानंदी वनमाली हलायुधः।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णु:-गतिसत्तमः।।60।।
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः।
दिवि: स्पृक् सर्वदृक व्यासो वाचस्पति: अयोनिजः।।61।।
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक।
संन्यासकृत्-छमः शांतो निष्ठा शांतिः परायणम।।62।।
शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः।।63।।
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृत्-शिवः।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः।।64।।
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमान्-लोकत्रयाश्रयः।।65।।
स्वक्षः स्वंगः शतानंदो नंदिर्ज्योतिर्गणेश्वर:।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः।।66।।
उदीर्णः सर्वत: चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः।।67।।
अर्चिष्मानर्चितः कुंभो विशुद्धात्मा विशोधनः।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः।।68।।
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः।।69।।
कामदेवः कामपालः कामी कांतः कृतागमः।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णु: वीरोअनंतो धनंजयः।।70।।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृत् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः।
ब्रह्मविद ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः।।71।।
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः।।72।।
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः।।73।।
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः।।74।।
सद्गतिः सकृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः।।75।।
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो-अनलः।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो-अथापराजितः।।76।।
विश्वमूर्तिमहार्मूर्ति: दीप्तमूर्ति: अमूर्तिमान।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः।।77।।
एको नैकः सवः कः किं यत-तत-पद्मनुत्तमम।
लोकबंधु: लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः।।78।।
सुवर्णोवर्णो हेमांगो वरांग: चंदनांगदी।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरऽचलश्चलः।।79।।
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः।।80।।
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृंगो गदाग्रजः।।81।।
चतुर्मूर्ति: चतुर्बाहु: श्चतुर्व्यूह: चतुर्गतिः।
चतुरात्मा चतुर्भाव: चतुर्वेदविदेकपात।।82।।
समावर्तो-अनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा।।83।।
शुभांगो लोकसारंगः सुतंतुस्तंतुवर्धनः।
इंद्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः।।84।।
उद्भवः सुंदरः सुंदो रत्ननाभः सुलोचनः।
अर्को वाजसनः श्रृंगी जयंतः सर्वविज-जयी।।85।।
सुवर्णबिंदुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधः।।86।।
कुमुदः कुंदरः कुंदः पर्जन्यः पावनो-अनिलः।
अमृतांशो-अमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः।।87।।
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः।
न्यग्रोधो औदुंबरो-अश्वत्थ: चाणूरांध्रनिषूदनः।।88।।
सहस्रार्चिः सप्तजिव्हः सप्तैधाः सप्तवाहनः।
अमूर्तिरनघो-अचिंत्यो भयकृत्-भयनाशनः।।89।।
अणु: बृहत कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः।।90।।
भारभृत्-कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः।।91।।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दंडो दमयिता दमः।
अपराजितः सर्वसहो नियंता नियमो यमः।।92।।
सत्त्ववान सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः।
अभिप्रायः प्रियार्हो-अर्हः प्रियकृत-प्रीतिवर्धनः।।93।।
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग विभुः।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः।।94।।
अनंतो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः।।95।।
सनात्-सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत स्वस्ति स्वस्तिभुक स्वस्तिदक्षिणः।।96।।
अरौद्रः कुंडली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः।।97।।
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः।।98।।
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः।
वीरहा रक्षणः संतो जीवनः पर्यवस्थितः।।99।।
अनंतरूपो-अनंतश्री: जितमन्यु: भयापहः।
चतुरश्रो गंभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः।।100।।
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मी: सुवीरो रुचिरांगदः।
जननो जनजन्मादि: भीमो भीमपराक्रमः।।101।।
आधारनिलयो-धाता पुष्पहासः प्रजागरः।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः।।102।।
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत प्राणजीवनः।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्यु जरातिगः।।103।।
भूर्भवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञांगो यज्ञवाहनः।।104।।
यज्ञभृत्-यज्ञकृत्-यज्ञी यज्ञभुक्-यज्ञसाधनः।
यज्ञान्तकृत-यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च।।105।।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः।
देवकीनंदनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः।।106।।
शंखभृन्नंदकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः।
रथांगपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः।।107।।
सर्वप्रहरणायुध ॐ नमः इति।
वनमालि गदी शार्ङ्गी शंखी चक्री च नंदकी।
श्रीमान् नारायणो विष्णु: वासुदेवोअभिरक्षतु।
Nirjala Ekadashi 2025
- फोटो : adobe stock
विष्णु चालीसा
दोहा
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥
चौपाई
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥
शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥
आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥
वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥
असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥
देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥
निर्जला एकादशी कितने समय तक रखी जाएगी?
निर्जला एकादशी की तिथि 6 जून 2025 को सुबह 2:15 बजे शुरू होकर 7 जून को सुबह 4:47 बजे तक रहेगी। इस बार एकादशी की तिथि करीब 24 घंटे तक बनी रहेगी और दोनों ही दिन उदयातिथि का संयोग बन रहा है।
भगवान विष्णु को जरूर अर्पित करें ये पवित्र चीजें
- भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि यदि तुलसी दल अर्पित किया जाए, तो वह समस्त पुष्पों से बढ़कर फल देता है। निर्जला एकादशी के दिन तुलसी पत्र से भगवान विष्णु की पूजा करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है और भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है।लेकिन धार्मिक नियमों के अनुसार एकादशी तिथि के दिन तुलसी पत्र तोडना एवं स्पर्श करना निषेध है,इसलिए एक दिन पहले ही तुलसी पत्र तोड़कर रख लें।
- भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। इस दिन उन्हें पीले रंग के फूल जैसे गेंदे, कनेर आदि अर्पित करने और पीले वस्त्र पहनाकर पूजन करने से विशेष फल प्राप्त होता है। इससे जीवन में शांति, सुख और समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
- नारियल को शुभता और समर्पण का प्रतीक माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु को श्रीफल अर्पित करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। यह न केवल देव पूजन को पूर्ण करता है, बल्कि जीवन में संतुलन, सफलता और संपन्नता भी लाता है।
भगवान विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात:
भगवान विष्णु का स्तुति मंत्र
शांताकारं भुजगशयनं, पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं, मेघवर्णं शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं, योगिभिर्ध्यानगम्यम्, वन्दे विष्णुं भवभयहरं, सर्वलोकैकनाथम्।।
भगवान विष्णु का शक्तिशाली मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
निर्जला एकादशी व्रत पारण समय
6 जून को एकादशी का व्रत रखने वाले लोग 7 जून 2025 को व्रत पारण दोपहर 1:44 बजे से शाम 4:31 बजे के बीच कर सकते हैं।
निर्जला एकादशी शुभकामना संदेश
- फोटो : amar ujala
भगवान विष्णु आएं आपके घर, जीवन को खुशियों से दे भर,
न हो जीवन में कोई भी दुख, घर-परिवार में बना रहे सुख।
निर्जला एकादशी की शुभकामनाएं।
निर्जला एकादशी शुभकामना संदेश
- फोटो : amar ujala
विष्णु जिनका नाम है, वैकुंठ जिनका धाम है,
निर्जला एकादशी के शुभ अवसर पर, श्रीहरि को शत-शत प्रणाम
निर्जला एकादशी की शुभकामनाएं।
निर्जला एकादशी पारण विधि
- फोटो : adobe stock
निर्जला एकादशी पारण विधि
- ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि (7 जून, शनिवार 2025) को पारण करें।
- सुबह स्नान करके साफ और शुद्ध वस्त्र पहनें।
- भगवान विष्णु को प्रणाम करें और पारण की भावना बनाएं।
- पीले फूल, तुलसी पत्र, चंदन, अक्षत और जल अर्पित करें।
- फल, दूध, मिष्ठान्न और तुलसी पत्र के साथ भगवान विष्णु को भोग लगाएं।
- तुलसी माला से ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र 108 बार जपें।
- विष्णु सहस्रनाम और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें और प्रणाम करें।
- व्रत में हुई भूलों के लिए भगवान से क्षमा मांगें और व्रत स्वीकार करने की प्रार्थना करें।
- किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को जल, अन्न, वस्त्र, पंखा, छाता, शक्कर, दक्षिणा आदि दान करें।
- विशेष रूप से जल से भरा हुआ कलश दान करना शुभ माना जाता है।
निर्जला एकादशी पारण में क्या खाएं?
निर्जला एकादशी पारण के समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का ध्यान लगाकर ‘ॐ विष्णवे नमः’ मंत्र का जप करें और तुलसी के पत्ते अपने मुँह पर रखें। इसके बाद गंगाजल पीना शुभ होता है। पारण के बाद हमेशा हल्का, सात्विक और शुद्ध भोजन ही करें ताकि व्रत का सही फल मिल सके।
निर्जला एकादशी व्रत का पारण
निर्जला एकादशी के व्रत का पारण 7 जून को द्वादशी तिथि को किया जाएगा। पारण व्रत का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम चरण होता है, जिसका अर्थ है उपवास का विधिपूर्वक समापन। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में सही समय, शुभता और श्रद्धा के साथ किया जाना आवश्यक है, तभी व्रत का पूरा फल मिलता है। शास्त्रों के अनुसार, यदि पारण समय पर द्वादशी तिथि में नहीं किया जाता है तो व्रत अधूरा और निष्फल माना जाता है। भगवान विष्णु स्वयं कहते हैं कि द्वादशी को समय पर पारण न करने से व्रत का पुण्य खत्म हो जाता है। पारण करने से व्रती को व्रत का पूर्ण फल, पुण्य और ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसलिए, पारण को बड़ी श्रद्धा और नियमबद्ध तरीके से करना चाहिए।
निर्जला एकादशी पर करें इन चीजों का दान
- निर्जला एकादशी के दिन जल का विशेष महत्व होता है। इस दिन मिट्टी या तांबे के पात्र में जल भरकर दान देना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
- इस दिन किसी ब्राह्मण, साधु या गरीब को फल या मिठाई का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
- निर्जला एकादशी के दिन फलों का दान करना चाहिए। यह बहुत शुभ होता है।
- निर्जला एकादशी पर आप अनाज का दान कर सकते हैं। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।
- निर्जला एकादशी पर आप क्षमतानुसार वस्त्रों का दान कर सकते हैं।
- आप पंखा, खरबूजा, गुड़, बिस्तर और छाता दान कर सकते हैं।
कितने समय के लिए रखा जाएगी निर्जला एकादशी व्रत
इस बार एकादशी की तिथि करीब 24 घंटे से अधिक तक बनी रहेगी और दोनों ही दिन उदया तिथि का संयोग बन रहा है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब एकादशी दो तिथियों पर आती है, तो गृहस्थ जनों को पहले दिन व्रत रखना चाहिए, जबकि जो लोग संन्यास मार्ग पर हैं या मोक्ष की कामना रखते हैं, वे 7 जून को एकादशी का व्रत रख सकते हैं।
गृहस्थ जनों के लिए पारण का समय
पहले दिन व्रत रखने वाले लोग 7 जून 2025 को व्रत पारण दोपहर 1:44 बजे से शाम 4:31 बजे के बीच कर सकते हैं।
7 जून को व्रत रखने वालों के लिए पारण का समय
दूसरे दिन व्रत रखने वाले 8 जून 2025 को सुबह 5:23 बजे से 7:17 बजे के बीच उपवास का पारण करें।
व्रत के दौरान जल ग्रहण का समय
जो श्रद्धालु 6 जून को उपवास करेंगे, उन्हें सूर्योदय से पहले यानी 05:23 बजे से पहले जल ग्रहण कर लेना चाहिए। व्रत के दौरान जल का सेवन वर्जित है। इसके बाद अगले दिन यानी 7 जून को हरि वासर के बाद दोपहर 01:44 से शाम 04:31 बजे के बीच ही जल पीना उचित रहेगा।
6 जून 2025 शुभ मुहूर्त और योग
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04:02 बजे से 04:42 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11:52 AM से दोपहर 12:48 बजे तक
रवि योग- सुबह 05:23 बजे से 06:34 बजे तक
राहुकाल- सुबह 10:36 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक (अशुभ समय)
7 जून 2025 शुभ मुहूर्त और योग
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04:02 बजे से 04:42 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त- दिन के 11:52 बजे से दोपहर 12:48 बजे तक
द्विपुष्कर योग- सुबह 05:23 बजे से 09:40 बजे तक
सर्वार्थ सिद्धि योग- 7 जून को सुबह 09:40 बजे से 8 जून सुबह 05:23 बजे तक
राहुकाल- सुबह 08:51 बजे से 10:36 बजे तक (अशुभ समय)
निर्जला एकादशी पर करें ये उपाय
- निर्जला एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी पत्र अर्पित करें और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 बार जाप करें।
- इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु को श्रीफल (नारियल) अर्पित करें और फिर इसे किसी जरूरतमंद को दान करें।
- इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
- निर्जला एकादशी पर अन्न, जल, वस्त्र और छाता का दान करें। यह उपाय स्वास्थ्य समस्याओं को भी कम करता है।
निर्जला एकादशी पारण का महत्व
निर्जला एकादशी का पारण द्वादशी तिथि को किया जाएगा। पारण व्रत का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम चरण होता है, जिसका अर्थ है उपवास का विधिपूर्वक समापन। शास्त्रों के अनुसार, यदि पारण समय पर द्वादशी तिथि में नहीं किया जाता है तो व्रत अधूरा और निष्फल माना जाता है। भगवान विष्णु स्वयं कहते हैं कि द्वादशी को समय पर पारण न करने से व्रत का पुण्य खत्म हो जाता है। पारण करने से व्रती को व्रत का पूर्ण फल, पुण्य और ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त होता है।
निर्जला एकादशी पारण विधि
- ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि (7 जून, शनिवार 2025) को पारण करें।
- सुबह स्नान करके साफ और शुद्ध वस्त्र पहनें।
- भगवान विष्णु को प्रणाम करें और पारण की भावना बनाएं।
- पीले फूल, तुलसी पत्र, चंदन, अक्षत और जल अर्पित करें।
- फल, दूध, मिष्ठान्न और तुलसी पत्र के साथ भगवान विष्णु को भोग लगाएं।
- तुलसी माला से ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र 108 बार जपें।
- विष्णु सहस्रनाम और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें और प्रणाम करें।
- व्रत में हुई भूलों के लिए भगवान से क्षमा मांगें और व्रत स्वीकार करने की प्रार्थना करें।
- किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को जल, अन्न, वस्त्र, पंखा, छाता, शक्कर, दक्षिणा आदि दान करें।
- विशेष रूप से जल से भरा हुआ कलश दान करना शुभ माना जाता है।
निर्जला एकादशी पारण में क्या खाएं?
निर्जला एकादशी पारण के समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का ध्यान लगाकर ‘ॐ विष्णवे नमः’ मंत्र का जप करें और तुलसी के पत्ते अपने मुँह पर रखें। इसके बाद गंगाजल पीना शुभ होता है। पारण के बाद हमेशा हल्का, सात्विक और शुद्ध भोजन ही करें ताकि व्रत का सही फल मिल सके।
ध्यान रखें ये बात
- पारण के समय केवल सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
- प्याज-लहसुन जैसे तामसिक खाद्य पदार्थों का परहेज करें।
- पूजा के दौरान शुद्धता और नियमों का विशेष ध्यान रखें।