उत्तर प्रदेश का चुनाव है केंद्र
अन्य प्रदेशों में तो एक बार पार्टी सारा ज़ोर लगाकर चुनाव मैदान में कूद सकती थी लेकिन उत्तर प्रदेश का मामला अलग है। इस राज्य से राष्ट्रपति चुने गए हैं, प्रधानमंत्री चुने गए हैं, रक्षामंत्री निर्वाचित हैं, और भी कई केंद्रीय मंत्री इस प्रदेश से हैं,पार्टी का सबसे बड़ा हिन्दू चेहरा मुख्यमंत्री के रूप में उनके साथ है, राहुल गाँधी को कांग्रेस के गढ़ में हराने वाली स्मृति ईरानी जैसी फायर ब्रांड नेत्री इसी राज्य से हैं और आधा गांधी ख़ानदान बीजेपी के साथ है (यह बात अलग है कि वरुण गांधी और मेनका गांधी इन दिनों अपने दल से प्रसन्न नहीं हैं )।
इसके अलावा प्रदेश की बड़ी समस्याओं से निपटने में सरकार विफ़ल रही है।हाल ही में कांग्रेस पार्टी की नेत्री प्रियंका गांधी और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की रैलियों में जिस तरह लोग उमड़े हैं ,उसने यक़ीनन भारतीय जनता पार्टी की नींद उड़ा दी होगी। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी अपना हारना पचा नहीं पाएगी। यह उसके अपने राजनीतिक भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।
आनन-फानन के फैसले
तीनों कृषि क़ानून जिस ढंग से संसद में पास कराए गए थे ,उसे पूरे देश ने देखा था।इससे केंद्र सरकार की बदनामी ही हुई थी। जानकार लोग हैरान थे कि जब बीजेपी केंद्र सरकार अपने दम पर चला रही है तो किसी भी क़ानून को पास कराने में लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर की उपेक्षा क्यों की गई? पार्टी पर बड़े पूंजीपतियों के हित संरक्षण का आरोप लगा और हिन्दुस्तान ने अब तक का सबसे लंबा अहिंसक आंदोलन देख लिया। इन पूंजीपतियों को तो बाद में भी फायदा पहुंचाया जा सकता है, लेकिन एक बार उत्तर प्रदेश का क़िला अगर भारतीय जनता पार्टी ने हाथ से निकल जाने दिया तो फिर यह तथ्य स्थापित हो जाएगा कि नरेंद्र मोदी का तिलिस्म अब टूटने लगा है।
निश्चित रूप से संसार का सबसे बड़ा यह दल नहीं चाहेगा कि ऐसी स्थिति निर्मित हो।इसीलिए बिना कैबिनेट की बैठक बुलाए या दिग्गजों को भरोसे में लिए प्रधानमंत्री ने कृषि क़ानून वापस लेने की घोषणा कर दी। देर आयद दुरुस्त आयद की कहावत कितनी काम आती है - यह देखना है।