ऑफिस में मेरा आखिरी दिन था। अगली सुबह दूसरे शहर उड़ जाना था। पुराने साथियों ने एक छोटी-सी विदाई रखी थी। फटाफट सारी औपचारिकताओं को निपटाकर, हम एक बार में चल दिए। यह वही बार था जिसमें मेरी न जाने कितनी उदास शामें गुजरी थीं। मेरे भीतर का मैं, मुझसे यहीं मिलता था। बात करता था। दोस्तों के आने से पहले ही मैं यहां पहुंच जाया करता- चेहरों में कहानियां खोजता। दूसरों की हंसी में खुद की खुशी। थिरकते और मदमस्त होते लोगों में बचपन। कितने ही किस्से और कहानियां, मेरे भीतर चलती और भीतर ही मर जाती। कविताएं बोलतीं फिर चुप हो जातीं।
तीन साल से ये ही सिलसिला चल रहा था और चौथे साल का दूसरा महीना था जब मेरी विदाई थी।
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