-इसके बाद स्वदेश आने पर उनके विचारों से प्रभावित होकर गायकवाड़ नरेश ने उन्हें बड़ौदा में अपनी निजी सचिव के पद पर नियुक्त किया। यहीं से वे कोलकाता आए और फिर महर्षि अरविंद आजादी के आंदोलन में कूद पड़े।
-उनके भाई बारिन ने उन्हें बाघा जतिन, जतिन बनर्जी और सुरेंद्रनाथ टैगोर जैसी क्रांतिकारियों से मिलवाया। इसके बाद वे 1902 में अहमदाबाद के कांग्रेस सत्र में बाल गंगाधर तिलक से मिले और बाल गंगाधर से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ गए।
-साल 1906 में बंग-भग आंदोलन के दौरान महर्षि ने बड़ौदा से कलकत्ता की तरफ कदम बढ़ाए और इसी दौरान उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
-नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने 'वंदे मातरम्' साप्ताहिक के सहसंपादन के रूप से अपना काम प्रारंभ किया। यहां से उन्होंने ब्रिटिश सरकार के अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते हुए जोरदार आलोचना की।
-ब्रिटिश सराकर के खिलाफ लिखने पर उन पर मुकदमा दर्ज किया गया, लेकिन वे छूट गए। हालांकि, इसके बाद 1905 में हुए बंगाल बिभाजन के बाद हुए क्रांतिकारी आंदोलन से इनका नाम जोड़ा गया और 1908-09 में उन पर अलीपुर बमकांड मामले में राजद्रोह का मुकदमा चला।
-मुकदमा चलने के बाद उन्हें जेल में डाला गया और अलीपुर जेल में उन्हें रखा गया। यहां से उनका जीवन पूरी तरह बदला और वे यहां साधना और तप करने लगे।
-महर्षि यहां गीता पढ़ा करते और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करते। कहा जाता है कि उन्हें अलीपुर जेल में ही भगावन कृष्ण के दर्शन हुए।
-वहीं, जब वे जेल से बाहर आए, तो आंदोलन से नहीं जुड़े और 1910 में पुड्डचेरी चले गए और यहां उन्होंने योग द्वारा सिद्धि प्राप्त की। यहां उन्होंने अरविंद आश्रम ऑरोविले की स्थापना की थी और काशवाहिनी नामक रचना की।
- महर्षि अरविंद एक महान योगी और दार्शनिके थे। उन्होंने योग साधान पर कई मौलिक ग्रंथ लिखे। वहीं, कहा जाता है कि निधन के चार दिन तक उनके पार्थिव शरीर में दिव्य आभा बनी रही, जिसकी वजह से उनका अतिम संस्कार नहीं किया गया और 9 दिसंबर 1950 को उन्हें आश्रम में ही समाधि दी गई।