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बिच्छू के जहर से हो सकता है कैंसर का इलाज!

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किसी सर्जन के लिए शरीर के जिन नाज़ुक हिस्सों का ऑपरेशन सबसे मुश्किल होता है, उनमें से दिमाग़ एक है।
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लेकिन जल्द ही डॉक्टर दिमाग़ की कैंसरग्रस्त कोशिकाओं की पहचानकर उन्हें बेहतर तरीक़े से हटा पाएँगे और इस काम में उनकी मदद करेगा एक ख़तरनाक ज़हर।

दिमाग़ के कैंसर का इलाज काफ़ी पेचीदा होता है। दिमाग़ के कैंसर को हटाने के लिए अक्सर सर्जरी ही एकमात्र रास्ता बचता है, लेकिन ऑपरेशन बहुत मुश्किल होता है।

इसके लिए अनुभवी और सधे हुए हाथों की ज़रूरत होती है और साथ ही आवश्यकता होती है ऐसी विशेषज्ञ नज़रों की, जो सारे कैंसर को पहचान कर उसे हटा सकें।

ट्यूमर पेंट
सिएटल स्थित फ्रेड हचिंसन कैंसर रिसर्च सेंटर में बच्चों के कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जिम ओल्सन इन मुश्किलों से लंबे समय से जूझ रहे हैं। उन्होंने अब एक नई तकनीक विकसित की है जो दिमाग़ के कैंसर के इलाज में बेहद कारगर हो सकती है- और इसका श्रेय जाता है बिच्छू के डंक को।
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जिम ओल्सन कहता है, "बिच्छू के डंक से तैयार की गई दवा है 'ट्यूमर पेंट'। ये दवा कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को ऑपरेशन से एक दिन पहले दी जाती है और इससे वे चमकने लगती हैं। इससे सर्जरी करने वाले डॉक्टर को कैंसरग्रस्त कोशिकाओं और स्वस्थ कोशिकाओं का अंतर करने में मदद मिलती है।"

इस पेंट को तैयार किया गया है बिच्छू की ख़तरनाक़ और ज़हरीली प्रजाति डेथस्टॉकर के डंक से निकलने वाले ज़हर से।

ओल्सन बताते हैं कि उन्हें ये विचार तब आया, जब उन्होंने एक छोटे बच्चे को देखा जो दिमाग़ी कैंसर से जूझ रहा था और उसने ओल्सन से कैंसर को लेकर कई तरह के सवाल किए।

मनुष्यों पर परीक्षण शुरू
ओल्सन ने कहा, "ब्लड ब्रेन बैरियर के कारण किसी भी अणु को दिमाग़ तक पहुंचाना बेहद कठिन काम है। इसी को ध्यान में रखते हुए बिच्छू के ज़हर का विचार आया।"

ओल्सन कहते हैं कि इस प्रक्रिया के इस्तेमाल से सर्जन की लगभग दो सालों की जद्दोजहद का समय बच जाएगा जब वे कैंसर को जानने-पहचानने में लगे होते हैं।

ओल्सन बताते हैं, "जब हमने इसे चूहों पर आज़माया तो कैंसर वाली कोशिकाएं चमकने लगी। जिससे उन्हें पहचानना और हटाना आसान हो गया।"

ओल्सन बताते हैं, "पहले हमने ट्यूमर पेंट का प्रयोग चूहों पर किया। नतीजे उत्साहजनक रहे। अब अमरीकी खाद्य और औषधि प्रशासन (एफ़डीए) ने मनुष्यों पर इसके परीक्षण की मंज़ूरी दे दी है।"
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साथ ही ओल्सन कैंसर से निपटने के अन्य ग़ैर पारंपरिक तरीक़ों पर भी काम कर रहे हैं।

इस शोध का ख़र्च क्राउड फ़ंडिंग से किया जा रहा है और जिम ओल्सन के मुताबिक़ अब तक मिला पैसा शोध के ख़र्च से अधिक ही है।

उन्होंने अपने प्रोजेक्ट का नाम वॉयलेट रखा है। वॉयलेट एक युवा कैंसर मरीज़ का नाम था जिन्होंने मरने से पहले अपना दिमाग़ प्रयोग के लिए दान कर दिया ताकि शोध जल्द से जल्द हो सके।
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