साहित्य अकादेमी द्वारा उर्दू के प्रख्यात लेखक, आलोचक और विद्वान तथा साहित्य अकादेमी के महत्तर सदस्य और पूर्व अध्यक्ष प्रो. गोपी चंद नारंग की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया।सर्वप्रथम साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार, उपाध्यक्ष माधव कौशिक एवं सचिव के. श्रीनिवासराव ने प्रो. नारंग के चित्र पर पुष्प चढ़ाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। श्री राव ने अपने वक्तव्य में कहा कि वह साहित्य अकादेमी से 40 वर्षों तक जुड़े रहे और उन्होंने साहित्य अकादेमी के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। वे केवल उर्दू के ही नहीं बल्कि भारतीय भाषाओं के भी बड़े पैरोकार थे। साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने उनके साथ अपनी विदेश यात्राओं को याद करते हुए कहा कि वह दोस्तों के दोस्त थे और उन्हें हम केवल उर्दू या भारतीय भाषाओं तक ही सीमित नहीं रख सकते। उनकी योग्यता वैश्विक स्तर की थी। उन्होंने उर्दू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाया।
साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वे उर्दू के भीष्म पितामह थे। उन्होंने उर्दू को अपना जीवन बना लिया था। दुनिया में जहां जहां उर्दू थी वहां वहां नारंग साहब थे। उनकी किताबों के पाठक और उनके भाषण सुनने के लिए हर जगह के श्रोता बेताब रहते थे। उनका लेखन भी लोकल से लेकर ग्लोबल था। उनके पुत्र तरुण जो ऑनलाइन अमेरिका से जुड़े ने कहा कि पापा हमेशा अपना जीवन उत्साह पूर्वक जीते थे और मुश्किलों कि परवाह बिल्कुल नहीं करते थे। उन्होंने उनके साथ बिताए पिछले 6 महीनों को याद करते हुए कहा कि उनका साथ हमें हमेशा याद रहेगा। वह हम सबके सुपरमैन थे।
साहित्य अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि वे उर्दू अदब के शीर्ष आलोचक थे और उनकी आलोचना सृजनात्मक थी। उर्दू संरचनावाद पर उनकी लिखी पुस्तक एक ऐसी पुस्तक है जो हर भाषा में होनी चाहिए। उन्हें अभी भी साहित्य अकादेमी की चिंता रहती थी। उनकी रुचि और अरुचि बहुत स्पष्ट थी। वे एक जिंदादिल इंसान थे और उनके भाषण हमेशा यादगार होते थे। सादिका नबाब सहर ने उन्हें याद करते हुए उनके एकेडमिक क्षेत्र में किए गए उनके योगदान को भी प्रस्तुत किया। चंद्रभान ख्याल ने उन्हें उर्दू अदबी दुनिया का शहंशाह कहते हुए याद किया। उन्होंने उनकी शख्सियत का सबसे बड़ा पहलू उनकी विनम्रता को बताया। उन्होंने उनके गंगा जमुनी तहजीब के पक्ष पर भी बात की।
उर्दू परामर्श मंडल के संयोजक शीन काफ निजाम ने कहा कि वह एक नदी थे जो कई घाटों से टकराते हुए बहते थे। यह घाट अन्य भाषाओं के थे जिन्हें वह अपने सरल प्रवाह से अमर कर गए। जानकी प्रसाद शर्मा ने उन्हें संवाद की संस्कृति को विकसित करने वाले महान लेखक के रूप में याद किया। कौसर मज़हरी ने कहा कि उनका क़द बहुत बड़ा था और वे अदब की कई धाराओं पर नजर रखते थे। उन्होंने उर्दू को नया जेहन दिया और आगे उर्दू किस रूप में विकसित हो उसका भी एक रोडमैप लोगों के सामने प्रस्तुत किया। वे सारी दुनिया के सामने उर्दू की आवाज थे। अजय मालवीय ने उन्हें इंसानियत की आवाज के रूप में याद करते हुए कहा कि ऐसी शख्सियत सदियों में पैदा होती हैं। उनका कार्यकाल दो सदियों के बीच में फैला हुआ है और उर्दू को हमेशा समृद्ध करता रहेगा।
हरीश त्रिवेदी ने उनके भाषणों को याद करते हुए कहा कि जब वह बोलते थे तो सुनने वाले विस्मित होकर उनकी बात सुना करते थे। उन्होंने अमीर खुसरो पर जो काम किया वह सभी के लिए महत्वपूर्ण और यादगार है। उनके अंदर दूसरों के गुणों को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी। कश्मीरी लेखक ज़मां अर्जुदाह ने कहा कि वह बहुत व्यवस्थित तरीके से अपना काम करते थे और उसका फायदा उनके साथ काम करने वाले लोगों को बेहतर ढंग से होता था। फारसी के विद्वान शरीफ हुसैन कासमी साहब ने कहा कि उन्होंने ज्ञान को परंपरा से जोड़े रखा और देश की सांझी संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम किया। इर्तेज़ा करीम ने कहा कि अब नई पीढ़ी को जरूरत है कि उनके कामों को आगे बढ़ाएं और उनके महत्व को समझें।
शोक सभा में अरुण महेश्वरी, सय्यद एहतेशाम हसनैन, शहजाद अंजुम, इब्ने कँवल, जयंत परमार एवं नारंग साक़ी ने भी भाग लिया।