राजोरी के कालाकोट के बाजीमाल में पाकिस्तानी लश्कर ए तैयबा का आतंकी कमांडर कारी के मरने के बाद सुरक्षा बल इसे बड़ी कामयाबी मान रहे हैं। वह एक साल से राजोरी-पुंछ में सक्रिय था। यह बात सुरक्षा एजेंसियों के लिए चौंकाने वाली है। सूत्रों के अनुसार लश्कर कमांडर को स्थानीय समर्थन मिल रहा होगा, और वह जंगल में बनी प्राकृतिक गुफाओं में छिपने व जंगल युद्ध में माहिर था। उसे जंगल में छिपे रहने और घात लगाकर हमला करने की विशेष ट्रेनिंग मिली थी। इसी कारण वह एक साल तक सुरक्षा एजेंसियों के राडार पर नहीं आया।
बाजीमाल में लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर कारी के मारे जाने के तुरंत बाद सेना ने एक बयान जारी कर बताया कि ढांगरी में हिंदुओं की हत्या का मास्टरमाइंड, कंडी केसरी हिल में पैरा कमांडो को शहीद करने वाला और अन्य कई आतंकी गतिविधियों में शामिल आतंकवादी लश्कर कमांडर बाजीमाल मुठभेड़ में मारा गया है। वह एक साल से राजोरी-पुंछ में सक्रिय था।
इस खबर ने सुरक्षा एजेंसियों और अन्य खुफिया एजेंसियों की नींद उड़ा दी है कि यदि कारी राजोरी-पुंछ में एक साल से सक्रिय था तो वह सुरक्षा एजेंसियों की नजर से कैसे बचा रहा। ऐसा माना जाता है कि जब भी कोई आतंकी किसी सुरक्षा एजेंसियों की सूची में आता है तो उसी दिन से उसकी उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। किसी भी आतंकी कमांडर की या आतंकी की आयु 3 या 4 महीने से अधिक नहीं होती। यानि कि 3 या 4 महीने के भीतर उसे ढेर कर दिया जाता है। लेकिन, कारी एक साल से सक्रिय था, और कई बड़ी-बड़ी घटनाओं को अंजाम देता रहा। फिर भी सुरक्षा एजेंसियों के राडार पर नहीं आया।
ऐसा भी माना जा रहा है कि कारी के एक साल तक जिंदा रहने और राजोरी-पुंछ में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने में उसे बड़े पैमाने पर स्थानीय समर्थन मिला होगा। उसका ओवर ग्राउंड वर्कर नेटवर्क काफी मजबूत होगा। अब सुरक्षा एजेंसियां और अन्य खुफिया विभाग कारी के उस नेटवर्क की तलाश में जुटे हैं, जिसने उसे एक साल तक सुरक्षा एजेंसियों की नजर से दूर रखा।