जम्मू। नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित संध्या धर दिव्यांग महिलाओं और जरूरतमंद बच्चों के लिए एक आशा की किरण बन कर उभरी हैं। उनकी प्रेरणा से कई दिव्यांग महिलाओं की जिंदगी में उजाला हुआ है। वहीं, जम्मू इंस्टीट्यूट ऑफ जनरल एजूकेशन एंड रिहैबिलिटेशन (जिगर) संस्था बनाकर संध्या एक ऐसी अलख जगा रही हैं, जहां पर दिव्यांग महिलाओं को आगे बढ़ने के अवसर और हौसला मिल रहा है, वहीं जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा।
जम्मू के गंग्याल में रहने वाली संध्या धर कश्मीरी विस्थापित हैं। दिव्यांग होकर भी संध्या ने संघर्ष के रास्ते पर चलकर दूसरों को प्रेरणा दी है। यहां जरूरतमंद बच्चों को पढ़ी लिखी दिव्यांग महिलाएं निशुल्क पढ़ाती हैं। इससे बच्चों को शिक्षा मिल रही है और दिव्यांग महिलाओं को आत्मविश्वास बढ़ रहा है। जिगर संस्था दिव्यांगों के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान की तर्ज पर काम कर रही है। संध्या के अनुसार शिक्षा संस्थानों व सार्वजनिक स्थलों पर दिव्यांगों के अधिकारों पर जागरूकता बढ़ाई जा रही है। संविधान में दिव्यांगाें के लिए क्या प्रावधान हैं, इस पर जानकारी दी जा रही है। उन्होंने कहा कि जम्मू संभाग के उधमपुर, रियासी, कठुआ, सांबा, जम्मू जिलों में दिव्यांगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने से लेकर सरकारी प्रावधानों के तहत अवसर दिलाने पर ध्यान दिया जाता है।
विभाग ने नहीं सुनी तो सीएसआर से दिलाई मदद
संध्या कहती हैं कि बहुत से मामलों में जब विभाग से मदद नहीं मिली तो सीएसआर के तहत व्यवस्था करवानी पड़ी। उन्होंने बताया कि सांबा जिले में एक दिव्यांग लड़की को व्हील चेयर के लिए सरकार के समक्ष मामला उठाया गया। सरकार के सलाहकार की ओर से भी जब सुनवाई नहीं हुई तो कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत व्हील चेयर दिलाई गई। ऐसे हजारों मामले हैं, जिन्हें वैकल्पिक व्यवस्था करते हुए मदद दिलाई गई।
विस्थापन का दर्द भी झेला
संध्या ने विस्थापन का दर्द भी झेला है। वे कहती हैं कि 9 साल की उम्र में वे कश्मीर घाटी से परिवार के साथ घर छोड़ने को मजबूर हुईं। किराये के कमरे में रहकर संघर्ष देखा। पंद्रह वर्ष की उम्र में ट्यूशन पढ़ानी शुरू की, जिसके बाद कॉमर्स में परास्नातक और बिजनेस एडमिनस्टेरेशन व कंप्यूटर में डिप्लोमा किया।
समाज की फिक्र न करें, आगे बढ़ते रहें
- संध्या ने कहा कि दिव्यांग महिलाएं इसकी जरा भी फिक्र न करें कि समाज उनके बारे में क्या सोचता और क्या कहता है। ईश्वर ने जो उपहार दिया है, उसका स्वागत कर आगे बढ़ने से कोई भी मंजिल दूर नहीं। अपने लिए खुद संघर्ष करते हुए आगे बढ़ें।