अरनिया। बिश्नाह से विधायक रहे नेकां नेता डॉक्टर कमल अरोड़ा के भाजपा में शामिल होने से सियासत में भारी बदलाव आया है। बिश्नाह में दो दशक से चल रही कांटे की टक्कर के दौर पर भी फिलहाल विराम लग गया है।
एक तरफ भाजपा नेता और पूर्व विधायक अश्वनी शर्मा तो अब दूसरी तरफ भाजपा में शामिल हुए नेकां नेता और पूर्व विधायक डॉक्टर कमल अरोड़ा। अभी इन दोनों में कांटे की टक्कर देखने को मिलती रही है।
वर्ष 2002 से शुरू हुई कांटे की टक्कर ने वर्ष 2014 के चुनाव में बिश्नाह के मतदाताओं ने बदलाव लाया और नेकां के बैनर तले चुनाव लड़ रहे डॉक्टर कमल अरोड़ा को विधायक चुना।
हालांकि दो ढाई वर्ष के बाद ही सरकार गिर गई। इन दोनों दिग्गजों में कांटे की टक्कर की बात करें तो वर्ष 2002 के चुनाव में डॉक्टर कमल अरोड़ा नेकां की टिकट पर, जबकि अश्वनी शर्मा निर्दलीय के तौर पर चुनाव में उतरे, जिसमें कांटे की टक्कर में डॉक्टर कमल अरोड़ा को हरा कर विजय हासिल की।
वर्ष 2008 में डॉक्टर कमला अरोड़ा बसपा, जबकि अश्वनी शर्मा निर्दलीय के तौर पर मैदान उतरे और मात्र 489 मतों से डॉक्टर कमल अरोड़ा को हरा कर विजय हासिल की।
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भी इन दोनों के बीच कांटे की टक्कर रही। मगर इस बार मतदाताओं ने नेकां की टिकट पर चुनाव लड़ रहे डॉक्टर कमल अरोड़ा को 2986 मत अधिक देकर विजयी बनाया। हालांकि इन दोनों दिग्गजों में से भाजपा टिकट देकर किस पर अपना दांव लगाएगी, यह कहना मुश्किल है। मगर यह तय है कि इनमें से एक पार्टी के विपरीत जाकर निर्दलीय के तौर पर चुनाव में जरूर उतरेगा।
बिश्नाह में विपक्ष हुआ कमजोर
बिश्नाह। क्षेत्र के पूर्व विधायक और नेशनल कांफ्रेंस के नेता डॉ. कमल अरोड़ा ने भाजपा कार्यालय जम्मू में प्रदेश प्रभारी तरुण चुग और प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना की मौजूदगी में समर्थकों के साथ भाजपा का दामन थाम लिया। उनके भाजपा में शामिल होने से चार विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ चुनाव में उन्हें कड़ी टक्कर देने वाले और पिछले चुनावों में भाजपा उम्मीदवार को हराकर जीतने वाले डॉ. कमल अरोड़ा के भाजपा में शामिल होने से क्षेत्र में अब जहां भाजपा का कार्यकर्ता अति उत्साह में है, वहीं विपक्ष क्षेत्र में कमजोर होता जा रहा है। भाजपा में चुनाव लड़ने वाले इच्छुक उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ रही है। जल्द ही कुछ और पार्टियों के ताकतवर नेता भाजपा में शामिल हो सकते हैं। वहीं पुराने कर्मठ संगठन से जुड़े भाजपा कार्यकर्ता अब इन नेताओं के सामने कितने दिनों तक टिक सकते हैं। इन नेताओं को पार्टी कितनी तरजीह देती है। संवाद