जम्मू-कश्मीर में सरकार गठन को लेकर अगले पंद्रह दिन बेहद अहम हैं। यदि इस बीच भाजपा और पीडीपी के रिश्तों पर जमीं बर्फ न पिघली तो मामला बहुत लंबा खिंच सकता है।
दोनों दलों के बीच सरकार गठन की स्थिति फिलहाल जस की तस है। भाजपा के रुख में नरमी आता देख संघ ने उसका पेंच कसा है। संघ ने भाजपा से दो टूक कहा है कि पीडीपी की सियासत चमकाने के लिए पार्टी अपनी सियासी जमीन से कोई समझौता न करे।
इसके बाद से सूबे में सरकार गठन का सियासी पेंच सुलझने के बजाय उलझता जा रहा है। वर्तमान स्थिति में पीडीपी और भाजपा दोनों दल एक-दूसरे के झुकने का इंतजार कर रहे हैं।
महबूबा को रियायत नहीं दी जाएगी
भाजपा के कुछ नेता महबूबा को थोड़ी रियायत बरतकर सरकार गठन के प्रयास को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे। लेकिन संघ के जरिए पेंच कसे जाने के बाद सबकी राय अब एक हो गई है कि महबूबा को रियायत नहीं दी जाएगी। बल्कि सरकार बनाने के लिए उन्हें खुद पहल करनी पड़ेगी।
बुधवार को संघ नेतृत्व ने सूबे की सियासी स्थिति पर अनौपचारिक मंथन किया। पहले से निर्धारित इस बैठक में उत्तर क्षेत्र के संघ नेतृत्व के अलावा सह सर कार्यवाह कृष्ण गोपाल, प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य और सह संपर्क प्रमुख अरुण कुमार जैसे राष्ट्रीय अधिकारी उपस्थित थे।
औपचारिक तौर पर इस बैठक में उत्तर भारत में चल रहीं संघ की तमाम गतिविधियों की समीक्षा हुई लेकिन अनौपचारिक तौर पर इसमें जम्मू-कश्मीर का मामला भी उठा।
महबूबा के रुख पर टिकी है सरकार बनने की संभावना
संघ की बैठक के बाद माना जा रहा है कि सरकार बनने की संभावना अब महबूबा के रुख पर है कि वह गठबंधन के एजेंडे में बिना बदलाव के आगे बढ़ती हैं या नहीं। भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि महबूबा को गठबंधन के पुराने शर्तों पर ही चलना होगा।
हालांकि, भाजपा के कुछ नेता कमजोर पड़ रही महबूबा को थोड़ी ताकत देकर सरकार गठन की कवायद को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे। मगर संघ ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जनमानस में पीडीपी की छवि मजबूत करने के लिए भाजपा कोई ऐसा कार्य नहीं करेगी जिससे उसकी अपनी छवि पर कोई आंच आए।
यदि महबूबा पुराने एजेंडे पर तैयार होती हैं तो उनकी मुलाकात भाजपा अध्यक्ष अमित शाह या अन्य बडे़ नेताओं से कराने में उसे कोई गुरेज नहीं है।