कश्मीरी पंडितों से किए वायदे को निभाता हुए दिखने पर आतुर मोदी सरकार उनके पुनर्वास कार्यक्रम के लिए नए सिरे से जोर लगा रही है। लेकिन घाटी में 'कश्मीरी पंडितों के लिए अलग बस्ती' बसाने की इसकी मुख्य योजना की घोषणा होते ही वह विवादों में घिर गई है। (गृह मंत्रालय की सात अप्रैल की प्रेस रिलीज़ में इस बारे में कहा गया था।)
आधिकारिक रूप से पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार के मुखिया, मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद, इन 'अलग बस्तियों' के लिए भूमि अधिग्रहण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस, हुर्रियत नेताओं और खुद पंडितों के एक तबके के विरोध के बाद पीडीपी तकलीफ के साथ इस बात पर जोर दे रही है कि- जैसा माना जा रहा है कि कश्मीरी पंडितों की अलग बस्तियां नहीं होंगी।
यह राज्य में बसावट के पारंपरिक तरीके की तर्ज पर मिश्रित बस्ती होंगी, जिनमें मुस्लिम भी शामिल होंगे। कश्मीरी पंडितों को अलग बस्ती में बसाने का विचार केंद्र को इसलिए लुभा रहा है क्योंकि इससे उसे सुरक्षा और प्रशासन में सुविधा हो जाएगी।
पंडित परिवारों की सुरक्षा का झंझट
सैकड़ों, हजरों जगहों पर अलग-अलग पंडित परिवारों की सुरक्षा का झंझट पालने के बजाय सरकार यकीनन एक सीमित संख्या में अति सुरक्षित बस्तियों पर ध्यान देना चाहेगी।
प्रशासनिक रूप से भी पंडित परिवारों को अपनी पसंद की जगह में अलग से बसाने की बजाय भूमि अधिग्रहण कर, पंडितों के लिए बस्ती में फ्लैट बनाना कहीं ज्यादा आसान है।
अपने घर लौटने के लिए सरकारी मदद का इंतजार कर रहे बड़ी संख्या में पंडितों के पास अब न तो अपनी ज़मीन बची है और न ही घर। शायद अब भी कुछ के पास बची हो लेकिन ज़्यादातर ने 1990 में ही अपनी जायदाद गंवा चुके हैं।
'खतरा'
लेकिन दूसरी तरफ चरमपंथी समूहों के लिए अलग-अलग बसे परिवारों के बजाय पंडितों की बस्ती एक आकर्षक निशाना हो सकती है। और इस खतरे की आशंका से यह बस्तियां न सिर्फ़ घैट्टो (द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले जर्मनी में यहूदियों की अविकसित बस्तियां) में बदल जाएंगी बल्कि भारी सैन्य दस्तों से घिरे परिसर बनकर रह जाएंगी।
इससे यहां बसे लोगों के लिए 'सामान्य' जीवन की संभावनाएं क्षीण हो जाएंगी। साल 2008 में शेख़पुरा, बडगाम में बनाए गए कश्मीरी पंडितों के आवासीय परिसरों के किस्से भी बताते हैं कि यहां रहने वाले पंडित परिवारों के इस बारे में अनुभव मिले-जुले हैं।
राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नजरिये से भी इस तरह अलग-थलग किए जाने के स्वाभाविक खतरे हैं। कश्मीर की ज़रूरत अपने विभिन्न मतभेदों को दूर करने की है। कश्मीरी परिवारों को वापस लाना इस प्रक्रिया की एक अनिवार्य शर्त हो सकती है लेकिन इसे अच्छी तरह सोच-विचार कर ही किया जाना चाहिए।
'प्रयोग कैसा रहा'
शायद मुफ्ती सरकार को एक प्यापक सामाजिक अध्ययन करवाना चाहिए कि शेखपुरा का प्रयोग कैसा रहा है। क्या वहां रहने वाले पंडित सुरक्षित महसूस करते हैं? क्या वह यह महसूस करते हैं कि वह अंततः अपने घर वापस आ गए हैं?
क्या वह अपने आस-पास के माहौल में घुलमिल पाए हैं? क्या उनके बच्चे घाटी के विस्तृत सांस्कृतिक माहौल में रच-बस गए हैं? क्या अपने आवासीय परिसर के बाहर उनके दोस्त हैं या फिर उनका संवाद बस एक-दूसरे से ही है।
बडगाम के मुस्लिम निवासियों से भी पूछा जाना चाहिए कि लौटे हुए कश्मीरी पंडितों से उनका संवाद कैसा है और क्या उन्हें कोई अड़चन या अवरोध महसूस होता है। इन सवालों के जवाब मिलने के बाद नीति निर्माताओं को एक बेहतर पुनर्वास नीति बनाने में मदद मिलेगी।
नई बस्ती ही एकमात्र विकल्प
जल्द ही भूमि अधिग्रहण कर फ्लैट बनाने के लिए अनुबंध करने से केंद्र की मोदी सरकार तो निर्णायक नजर आएगी लेकिन मुफ्ती को एक अच्छी तरह से तैयार योजना पर ही काम करना चाहिए।
अगर नई बस्ती ही एकमात्र विकल्प है तो फिर इसमें कश्मीर का मिश्रित स्वभाव परिलक्षित होना चाहिए- वैसा ही जैसा कि पंडितों को भागने पर मजबूर किए जाने से पहले था।
कश्मीरी मुसलमानों और पंडितों की दो पीढ़ियां एक दूसरे को जाने बिना गुजर गई हैं। उन्हें इतना भौतिक और सामाजिक स्थान दिया जाना चाहिए कि वह सांस्कृतिक रूप से फिर से जुड़ सकें।
पुनर्वास का मतलब सिर्फ भौतिक रूप से बसना नहीं है बल्कि यह एक खास जीवनशैली की वापसी भी है। यह यह तारों की बाड़ से घिरे घैट्टो में नहीं हो सकता।