रियासत की सियासत में उस वक्त नया मोड़ आ गया है, जब नेशनल कांफ्रेंस ने राज्यपाल को पत्र सौंप पीडीपी को समर्थन देने की बात कही है। इन दोनों पार्टियों का मिलन किसी के गले नहीं उतरेगा। दोनों ही दलों का आधार कश्मीर घाटी पर आधारित है।
दोनों पार्टियां एक ही स्पेस के लिए लड़ रही हैं। इनका इकट्ठे होना ऐसा ही है, जैसे भाजपा और कांग्रेस का एक होना। इन दोनों दलों की स्थिति उसी प्रकार है, जैसे उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती की पाटियों और तमिलनाडु में डीएमके और एआईडीएमके का मिलना होना।
यह दल एक नहीं हो सकते। यह दल अपने-अपने प्रदेश में एक ही स्पेस के लिए लड़ती हैं। चूंकि नेकां सत्ता में रहना चाहती है, इसलिए वह पीडीपी को समर्थन देने की बात कर रही है।
जम्मू में कांग्रेस को अवाम ने नकारा
हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में एक सीधी बात सामने आई है। जम्मू में कांग्रेस को अवाम ने नकारा है और भाजपा को जनादेश दिया है। उसी तरह कश्मीर घाटी में पीडीपी को स्वीकार किया गया, जबकि नेशनल कांफ्रेंस को लोगों ने बाहर का रास्ता दिखाया है।
लोगों के जनादेश का सम्मान करना है तो जिन पार्टियों को लोगों ने जनादेश दिया है, वह सरकार बनाए। जिन्हें लोगों ने जनादेश नहीं दिया है, उन्हें सरकार में नहीं आना चाहिए। पीडीपी और भाजपा को ही मिलकर सरकार बनानी चाहिए।
यह सरकार कामयाब भी हो सकती है। इससे दोनों संभागों को बराबर का प्रतिनिधित्व मिलेगा। यह सही है कि पीडीजी और भाजपा की सोच एक जैसी नहीं है। लेकिन रियासत के विकास के लिए दोनों को हाथ मिला लेने चाहिए।
केंद्र में भाजपा की सरकार
केंद्र में भाजपा की सरकार है और ऐसे में जम्मू-कश्मीर की सरकार में उनकी भूमिका न होने से प्रदेश को केंद्रीय मदद के नुकसान की चर्चाएं आम हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है।
जम्मू-कश्मीर का जो हक है, उन्हें केंद्र से मिलेगा। देश में कई ऐसे राज्य हैं, जहां गैर भाजपा सरकारें हैं। उन्हें केंद्र से उनका हक मिलता है। ऐसा नहीं है कि केंद्र में सत्ताधारी दल की सरकार प्रदेश में न हो तो केंद्र उसे तंग करेगा।