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मचैल यात्रा आज से शुरू, प्रशासन की तरफ से व्यवस्था पूरी, पांच सितंबर को होगी खत्म

Thu, 25 Jul 2019 01:33 AM IST
Pranjal Dixit न्यूज डेस्क, अमर उजाला, किश्तवाड़
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मचैल यात्रा - फोटो : अमर उजाला
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मचैल माता की यात्रा आज से शुरू हो रही है। जिला प्रशासन ने बैठक कर संबधित विभागों पीएचई, पीडब्लूडी, बिजली, यातायात, चिकित्सा, पुलिस समेत अन्य को इस यात्रा की व्यवस्था के बारे में पहले ही जिम्मेदारी सौंप दी है।
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प्रशासन की तरफ से ठाठरी से मचैल तक की सुरक्षा व्यवस्था को पुलिस के हवाले किया है। इसमें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और सेना के जवान तैनात रहेंगे। जिला प्रशासन की तरफ से ठाठरी से लेकर मचैल तक कई जगहों पर निशुल्क लंगरों के लिए स्वीकृति दी है। कुछ जगहों पर 25 से ही लंगर शुरू हो रहे हैं। 

जिला विकास आयुक्त अंग्रेज सिंह राणा ने बताया कि मचैल यात्रा के लिए पूरी तैयारी की गई है। चिकित्सा विभाग से लेकर पीडब्लूडी तक हर विभाग की जिम्मेदारी तक की गई है। इसमें किसी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं होगी। यात्रा के दौरान रात के समय किसी भी यात्री को आगे जाने की अनुमति नहीं है। किश्तवाड़ से गुलाबगढ़ तक वाहन नहीं चलाया जा सकता।
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हर पड़ाव पर चिकित्सा की सुविधा रखी जाएगी। भवन में भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर दिए गए हैं। औपचारिकता पूरी करने के बाद ही मंदिर के कपाट खुलेंगे। बुधवार रात भर मंदिर परिसर में जगराता हुआ। एसएसपी शक्ति कुमार पाठक ने बताया कि यात्रा के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। जम्मू से लेकर मचैल तक कई पुलिस अधिकारियों की तैनाती कर दी गई है।  

 एआरटीओ नीरज शर्मा से बताया कि सरकार की तरफ से जो भी किराया तय किया गया है। उसे से लिया जाएगा। उन्होंने कहा ओवरलोडिंग के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर जांच जारी रहेगी। उन्होंने बताया कि इस यात्रा को लेकर पाडर में भी वाहन चालकों को जागरूक किया गया है। चिशोती गांव के पास नदी पर बने पुल की हालत जर्जर देखते हुए उसे ठीक करवा दिया गया है। 

प्राचीन बौद्ध धर्म की गुफाओं के भी करते हैं दर्शन
लगभग 40 वर्षों से चली आ रही यात्रा में माता चंडी के दर्शन करने के साथ शिव पर्वत पर शिवलिंग की पूजा की जाती है। इसके अलावा मचैल गांव के दोनों तरफ हांगो- हलोती के पास और लुसेंड़ी गांव में बनी बौद्ध धर्म के प्राचीन गुफाओं को देखने के लिए भी यात्री जाते हैं। 

गौरतलब है कि मचैल गांव हिमाचल और लद्दाख की सीमाओं के साथ लगता है। इसीलिए यहां के लोगों के संबंध भी गहमाचल और लद्दाख के लोगों के साथ है। इनकी बोली, रहन सहन, खानपान और रीति रिवाज पूरी तरह से मेल खाते हैं। इन दोनों गुफाओं में प्राचीण समय में लिखी भोज पत्र पर धार्मिक ग्रंथ हैं। इसके अलावा बौद्ध धर्म गुरुओं की मूर्तियां भी विद्यमान हैं।

दीवारों पर सुंदर चित्रकारी भी है, बड़े-बड़े और छोटे ड्रम भी हैं। इन्हीं गावों से होकर सुमाचाम और लद्दाख के लिए भी रास्ता है। ठीक इसी पहाड़ी के ऊपर कई किलोमीटर दूर नीलम घाटी है, जिसके नाम से पूरा पाडर प्रसिद्ध भी है। इस इलाके में कई प्राचीन मंदिर हैं। इस पाडर में कई पर्वतारोही भी आते हैं। चार साल पहले यहां बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा भी लाए थे। 

 
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5374 फीट की ऊंचाई पर बना है मंदिर 
पहले इस यात्रा में डोडा जिले के ही यात्री भाग लेते थे। अब राज्य समेत देश-विदेश के यात्री भी इसमें भाग लेते हैं। अब मंदिर में पूरे वर्ष माता के जागरण जम्मू से करीब सवा तीन सौ किलोमीटर की दूरी पर माता का यह मंदिर मौजूद है। जानकारी के अनुसार समुद्र तल से 5374 फुट ऊंचाई पर मंदिर बना है। लगातार जम्मू से ही माता की जोत निकलती है। जो कि पक्का डंगा से भद्रवाह जातीहै। दूसरे दिन किश्तवाड़ पहुंचती है। 

माता की छड़ी का पहला पड़ाव किश्तवाड़ 
माता मचैल वाली की यात्रा का पहला पड़ाव किश्तवाड़ होता है।  दूसरा अठोली, तीसरा मस्सू, चौथा चिशोती और पांचवें पर भवन। जहां माता की छड़ी पहुंचने पर हुजूम उमड़ता है। हजारों यात्री इस यात्रा का स्वागत करते हैं। इस दृश्य को को देखने के लिए लोग उत्सुक रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों से यात्रियों की संख्या बढ़ने से लोगों का आना-जाना लगा रहता है। हेलीकाप्टर से माता की छड़ी पर फूलों की वर्षा की जाती है।

इन स्थानों पर रहेंगे लंगर 
ठाठरी से लेकर मचैल तक अन्य स्थानों पर जैसे किश्तवाड़ शहर से 5 किमी पहले शालीमार के पास, शहर में सरकूट मंदिर, जेलाना गांव के पास, गलहार, गुलाबगढ़, अठोली, मस्सू, कुंडेल, चिशोती, हमूरी गांव, दर्शनी द्वार के साथ और मचैल दरबार पर निशुल्क लंगर लगेंगे। 

ठंडा इलाका होने के कारण, दवा-पानी साथ रखें 
ठंडा इलाका होने के कारण लोगों को मौसम को देखते हुए गर्म कपड़े रखने चाहिए। इसके अलावा टार्च, छाता व दवाइयां अपने पास जरूर रखें। हमूरी में लंगर लगाने वाले भीषण गुप्ता निशुल्क दवाइयां वितरित करते हैं। इसके अलावा चिकित्सा विभाग की तरफ से भी व्यवस्था की गई है। इसके अलावा सुनसान और पैदल सफर करने के लिए रास्ता कठिन है। यात्रियों को रात में सफर नहीं करना चाहिए। रास्ते के साथ-साथ (भोट नाला) नदी बहती है, फिसलन भी है जिससे हादसे का डर लगा रहता है। 

लोगों का उमड़ती है भीड़ करते हैं स्वागत 
किश्तवाड़ वासियों के लिए इस यात्रा का बहुत ही महत्व है। जिस दिन यहां छड़ी पहुंचती है तो हजारों लोग उमड़ पड़ते हैं। जिस दिन यहां से अगले पड़ाव के लिए यात्रा निकलती है तो जनसैलाब स्वगत करता है। स्कूलों में विशेष अवकाश रखा जाता है। माता के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठता है। है। वह भी माता के भगत ठाकुर कुलवीर सिंह ने जब छड़ी लाने से मना किया है तो। लोगों में माता के भगत के साथ बड़ी श्रद्दा जुड़ी हुई है, कारण कि उन्होंने ही लोगों में माता चंड़ी के प्रति भक्ती के जोड़ा है। लोगों में काफी निराशा है। सभी लोगों का कहना है कि इस यात्रा के लिए श्राईन बोर्ड बने ताकि इलाके में विकास सहित ट्रांसपेरेंसी रहे। लोगों की मांग है कि माता चंडी के साथ जुडी जितनी भी संपति है, चाहे वह मचैल में हो याफिर भद्रवाह, जम्मू व पाडर में हो उसका बोर्ड बनना ही चाहिए।
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