शोपियां जिले में स्थित कपालेश्वर मंदिर को बाल गया व तीर्थराज कपाल मोचन के नाम से जाना जाता है। श्राद्ध पक्ष में यहां देश के विभिन्न राज्यों से लोग अपने प्रियजनों के श्राद्ध कर्म के लिए पहुंच रहे हैं।
बिहार के गयाजी में पितरों के पिंडदान और तर्पण की परंपरा से तो देशभर के लोग परिचित हैं, लेकिन कश्मीर में भी एक ऐसा तीर्थ है जहां बच्चों और अकाल मृत्यु के शिकार अविवाहितों के आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है।
विज्ञापन
शोपियां जिले में स्थित कपालेश्वर मंदिर को बाल गया व तीर्थराज कपाल मोचन के नाम से जाना जाता है। श्राद्ध पक्ष में यहां देश के विभिन्न राज्यों से लोग अपने प्रियजनों के श्राद्ध कर्म के लिए पहुंच रहे हैं। आतंकवाद के दौर में 90 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के बाद करीब दो दशक तक वीरान रहे इस प्राचीन तीर्थस्थल पर अब फिर से श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ी है। यह श्रीनगर से 58 किलोमीटर और शोपियां शहर से महज दो किलोमीटर दूर है।
कभी रहा कश्मीरी हिंदुओं की आस्था का बड़ा केंद्र
तीर्थराज कपाल मोचन प्रबंध समिति के प्रधान अशोक सत्थू के अनुसार, कभी कश्मीरी हिंदुओं की यहां बड़ी संख्या में मौजूदगी रहती थी। पलायन के बाद लंबे समय तक यह स्थान सूना रहा। अब धीरे-धीरे जम्मू और देश के अन्य हिस्सों से लोग अपनी जड़ों और पुरखों से जुड़े इस तीर्थ की ओर लौट रहे हैं। मान्यता है कि यहां भगवान शिव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। इसी वजह से यह स्थान कपाल मोचन कहलाया।