जम्मू-कश्मीर के मतदान इतिहास को देखें तो 1962 से 2014 तक सबसे अधिक वोट 1987 में डाले गए। इस दौरान 74.88 फीसदी मतदान हुआ। महिलाओं ने भी जमकर वोट डाले थे। यही वजह रही कि महिलाओं का मतदान अनुपात भी 70.36 फीसदी रहा।
जम्मू-कश्मीर में मंगलवार को विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण के लिए वोट डाले गए। शांति बहाली के प्रयास में अनुच्छेद-370 हटने और राज्य का दर्जा वापस मिलने की उम्मीद के बीच हुए इस चुनाव में मतदाताओं का जोश भी मतदान केंद्रों पर दिखा।
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खूब वोटिंग हुई लेकिन 37 साल पुराना मतदान प्रतिशत का रिकॉर्ड नहीं टूट सका। तीसरे चरण में हुई 67 प्रतिशत वोटिंग के बाद तीनों चरण में कुल मतदान 60 प्रतिशत ही हो सका।
मतदान बूथों पर वोटरों को जुटाने के लिए तमाम प्रयासों के वावजूद तीसरे चरण की 40 सीटों पर मतदान 67 फीसदी ही पार हो सका। हालांकि लोकसभा चुनाव 2024 के 58.58 फीसदी की तुलना में यह आंकड़ा बेहतर है।
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जम्मू-कश्मीर के मतदान इतिहास को देखें तो 1962 से 2014 तक सबसे अधिक वोट 1987 में डाले गए। इस दौरान 74.88 फीसदी मतदान हुआ। महिलाओं ने भी जमकर वोट डाले थे। यही वजह रही कि महिलाओं का मतदान अनुपात भी 70.36 फीसदी रहा।
पुरुषों ने इस दौरान 78.65 फीसदी मतदान किया। कहा जाता है कि कांग्रेस-नेकां गठबंधन में हुए चुनाव में बदलाव की बयार की उम्मीद ने इतना अधिक मतदान कराया था। वहीं दूसरी तरफ 1987 में चुनाव में धांधली का आरोप भी लगा था। इसके बाद ही घाटी में आतंकवाद की शुरूआत हुई। यह चुनाव अब तक का सबसे विवादित चुनाव कहा जाता है। कांग्रेस ने यहां 76 में से 26 सीट जीतीं और 40 सीट जीतने वाली नेकां के साथ फारूक अब्दुल्ला ने सरकार बनाई।
दो साल बाद ही 1989 के लोकसभा चुनाव में कश्मीर में बहुत कम मतदान हुआ। हालात ऐसे बने कि बारामुला में 5.48, अनंतनाग में 5.07 प्रतिशत ही वोट डाले गए। श्रीनगर में तो मतदान ही नहीं हुआ। बिगड़े हालात के बीच 1990 में गवर्नर शासन लागू हुआ जो छह साल चला। रिकॉर्ड मतदान के बाद भी चुनी गई राज्य सरकार तीन साल पूरे नहीं कर पाई।
2002 में सबसे कम मतदान
प्रदेश में चुनाव का एक इतिहास यह भी है कि 1962 में पहले विधानसभा चुनाव में 40.3 प्रतिशत मतदान के बाद सबसे कम वोटिंग 2002 में हुई। पहले मतदान के समय कम वोटिंग का कारण जागरूकता की कमी थी। 2002 तक वोट के अधिकार के लिए लोग जागरूक हो चुके थे।
जानकारों का कहना है कि 2002 में कम मतदान की सबसे बड़ी वजह हुर्रियत का चुनाव बायकॉट थी। ऐसे में कश्मीर घाटी में 3.5 फीसदी मतदान ही हो सका। दूसरी वजह, पहली बार यहां ईवीएम से चुनाव होना था। ईवीएम का उपयोग लोगों के लिए एक नई चीज थी तो इसका असर कम मतदान के रूप में सामने आया।
मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट की वजह से बढ़ा मतदान
राजनीतिक विश्लेषक रेखा चौधरी का कहना है कि 1986 में कांग्रेस और नेकां का गठबंधन हुआ। इसके विरोध में कई राजनीतिक दलों ने जमात की अगुवाई में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) का गठन किया। 1987 के चुनाव में एमयूएफ ने लोगों को एकजुट करने का काम किया।
इसका सीधा असर मतदान प्रतिशत बढ़ने के रूप में सामने आया। हालांकि एमयूएफ को अपेक्षित जीत इस चुनाव में नहीं मिल सकी। इस चुनाव ने जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
तीनों चरण में इस तरह हुआ मतदान
पहला चरण 61.13 प्रतिशत
दूसरा चरण 57.07 प्रतिशत
तीसरा चरण 67
कुल मतदान 61.70