अनुच्छेद 370 हटने के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर में चुनाव हो रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद पहला चुनाव हो रहा है। लोकतंत्र के इस उत्सव मंथन से राज्य के लोगों को विकास का नया सूरज निकलने की उम्मीद है।
इस बार का जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव घाटी की सियासत में नई पटकथा लिख रहा है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद यह पहला विस चुनाव हैं। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद पहली बार राज्य के लोग मतदान करेंगे। जमात-ए-इस्लामी के नेता साल 1987 के बाद से चुनावों का लगातार बहिष्कार करते आए हैं, लेकिन इस साल हुए लोकसभा चुनाव में जमात के कई नेताओं ने वोट डालकर लोगों को हैरान किया। अब विस चुनाव भी घाटी की छवि व विचारधारा बदलने का चुनाव होगा।
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दरअसल, जम्मू-कश्मीर का नाम आते ही देश के आम आदमी के दिमाग में जो छवि उभरती है, वह सिर्फ खूबसूरत वादियों की नहीं होती है। पत्थरबाजी, अलगाववाद, मुठभेड़ समेत अन्य चीजें भी उभरती हैं। राज्य के लोग भी इनसे थक चुके हैं और वह विकास के रास्ते पर चलने को तैयार हैं। इसका संदेश वह लोकसभा चुनाव में बंपर मतदान से दे चुके हैं।
ऐसे में यह चुनाव राजनीतिक-सामाजिक समीकरण भी बदल रहा है। करीब 37 साल चुनावी मैदान में उतरकर चुनाव लड़ रहे जमात-ए-इस्लामी के नेता इंजीनियर रशीद कह रहे हैं कि वह इस चुनाव के जरिए कश्मीर के मुद्दों का हल चाहते हैं। इस संगठन की मौजूदगी कश्मीर के सोपोर, कुलगाम, शोपियां और पुलवामा में मजबूत है।
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संसद हमले के दोषी अफजल गुरु के भाई एजाज अहमद गुरु सोपोर क्षेत्र से मैदान में हैं। इसी तरह जेल से चुनाव लड़ रहे सरजन अहमद वागे घाटी में होने वाली विरोध रैलियों का प्रमुख चेहरा रहते थे। अब वह भी पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं। ऐसे में इस चुनाव का पहला चरण बहुत महत्वपूर्ण रहने वाला है।
2014 के विधानसभा चुनाव की ही बात करें तो उसमें अलगाववादी समूहों ने बहिष्कार किया था और लोगों से भी अपील की थी कि वोट न करें उसके बावजूद करीब 66 फीसदी मतदान हुआ था। 13 निर्वाचन क्षेत्रों में यह 70 प्रतिशत से अधिक था और 50 फीसदी तो कई सीट पर रहा।
पहली लड़ाई ही मतदान प्रतिशत को पुराने आंकड़े के पार लेकर जाना होगा। यहीं से बदलाव के संकेत दिखाई देंगे। इस राज्य के लिए यही शुभ संकेत हैं कि जो लोकतंत्र के विरोधी थे वे सभी इसका हिस्सा बन रहे हैं और भविष्य में यहां की अवाम की नुमाइंदगी करेंगे।
केंद्र शासित प्रदेश की पहली निर्वाचित सरकार होगी
अनुच्छेद-370 हटने के बाद अस्तित्व में आए केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर में यह पहला विधानसभा चुनाव है। इससे पहले 2014 में जब अंतिम बार विधानसभा चुनाव हुआ था तो जम्मू-कश्मीर राज्य था और लद्दाख भी इसका भाग था। तब पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार बनी थी, जो जून 2018 में भंग हो गई। इसके बाद से जम्मू-कश्मीर में कोई निर्वाचित सरकार नहीं है। अब इस चुनाव के बाद राज्य को नई सरकार मिलेगी।
घाटी में अलगाववादी हमेशा ही लोकतंत्र का विरोध करते रहे हैं। वह भी चुनावी प्रक्रिया के रास्ते से समाज की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं। यह बदलाव न कि सिर्फ लोकतंत्र बल्कि जम्मू कश्मीर के लिए शुभ संकेत हैं। मौलवी सरजन अहमद वागे घाटी में होने वाली विरोध रैलियों का प्रमुख चेहरा माने जाते रहे हैं, अब वह भी चुनावी मैदान में हैं। यह बदलाव अच्छा है और यह चुनाव इस राज्य की दिशा तय करेगा।- डॉ. सुमन शुक्ला, प्रोफेसर, इतिहास विभाग, कानपुर यूनिवर्सिटी
निकाय चुनाव होने के बाद से ही माहौल बदल गया था। वहीं से स्वस्थ लोकतंत्र की शुरुआत हो गई। यह चुनाव जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए उम्मीद की किरण है। हां एक समस्या भविष्य में देखने को मिल सकती है कि यह अब केंद्र शासित राज्य है और यहां के मुख्यमंत्री को उतने अधिकार नहीं मिलेंगे तो यह बड़े-बड़े वादे कैसे पूरे करेंगे। केंद्र सरकार या तो इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे या फिर मुख्यमंत्री की शक्तियां बढ़ाए। कुल मिलाकर जम्मू कश्मीर के लिए एक अच्छी सुबह है।- दीपक गुप्ता, चुनाव विश्लेषक, जम्मू कश्मीर