जम्मू-कश्मीर में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अकादमी स्थापित करने की मांग मुखर होने लगी है। जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष प्रो. रसाल सिंह ने उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को पत्र लिखकर जम्मू-कश्मीर में भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन का अनुरोध किया है।
प्रोफेसर सिंह ने पत्र में लिखा कि संसद में पारित जम्मू-कश्मीर आधिकारिक भाषा अधिनियम-2020 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर में पूर्ववर्ती राजभाषाओं-उर्दू और अंग्रेजी के अलावा हिंदी, डोगरी और कश्मीरी तीन नई भाषाओं को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी स्थानीय, मातृ, भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन पर जोर दिया गया है। इसलिए जम्मू-कश्मीर में हिंदी, डोगरी और कश्मीरी के विकास और प्रचार-प्रसार पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
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सिंह ने पत्र में लिखा कि सांस्कृतिक सेतु के रूप में हिंदी राष्ट्रीय एकीकरण की भाषा है। यह देश की मुख्यधारा से जुड़ने की माध्यम भाषा होने के साथ-साथ विश्वभाषा के रूप में उभरती हुई रोजगार और अवसरों की भाषा भी है। इसलिए जम्मू-कश्मीर में हिंदी के प्रचार-प्रसार और विकास पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि यहां का समाज देश और दुनिया के साथ संवाद और संपर्क स्थापित करते हुए अपना सर्वोत्तम योगदान दे सके। हिंदी के फैलाव से स्थानीय लोगों के लिए नौकरी, व्यापार, पर्यटन आदि में अवसर बढ़ेंगे और रोजगार की असीम संभावनाएं होंगी।
हिंदी के विकास के लिए ये दिए सुझाव
तत्काल प्रभाव से हिंदी अकादमी, डोगरी अकादमी और कश्मीरी अकादमी की स्थापना, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के जम्मू केंद्र की स्थापना की जाए (जो जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में खोला जा सकता है)। विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों में विशेष रूप से हिंदी में अनुवाद, पत्रकारिता, कार्यालयी-प्रशासनिक हिंदी, रचनात्मक-व्यावसायिक लेखन जैसे कौशल-आधारित और रोजगारपरक पाठ्यक्रम प्रारम्भ किए जाएं। प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय में हिंदी, डोगरी और कश्मीरी के कम से कम एक-एक शिक्षक की नियुक्ति और इन भाषाओं के शिक्षकों के खाली पदों को यथाशीघ्र भरा जाए। जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू विश्वविद्यालय, कश्मीर विश्वविद्यालय, श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय और बाबा गुलामशाह बादशाह विश्वविद्यालय में इन तीनों भाषाओं के विभाग खोले जाएं और प्रत्येक सरकारी कार्यालय में राजभाषा अधिकारियों की नियुक्ति की जाए व इन तीनों भाषाओं में समस्त सरकारी दस्तावेजों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।